चौ. बंसीलाल विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद आरएसएस के सदस्य एवं राष्ट्रीय प्रबुद्
भिवानी। गीता हमें बेहतर जीवन जीने की कला सिखाती है। यह हमें तनावमुक्त कर कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और शांति बनाए रखने का उपदेश देती है। गीता का अध्ययन हमारे आध्यात्मिक विकास में सहायक है। गीता में मानव अधिकारों का रक्षण है।
यह विचार आरएसएस के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं राष्ट्रीय प्रबुद्ध चिंतक इंद्रेश कुमार ने चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय एवं पंडित सीताराम शास्त्री शिक्षण महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में गीता जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि एवं वक्ता व्यक्त किए।
हम अपने कर्तव्यों का जागरण करते हुए अपने अधिकारों को सीमित करें। कार्यक्रम गीता एवं मानव अधिकार विषय पर आयोजित किया गया। गीता जयंती संगोष्ठी की अध्यक्षता कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने की। कार्यक्रम में भारत माता मंदिर संस्थापक आचार्य महंत माई महाराज और हनुमान जोहड़ी धाम के संस्थापक महंत चरणदास महाराज का सानिध्य रहा। उन्होंने कहा कि प्रेम सर्वोच्च है और प्रेम करना मना नहीं है। हमें प्रेम और वासना के अंतर को समझना पड़ेगा। यदि प्रेम से ओत प्रोत होंगे तो श्रीराम बनोगे और यदि वासना और नफरत, अहंकार से ओत प्रोत होंगे तो रावण बनोगे। युवा वासना और विकारों से बचें और गाली, गुस्सा, वासना और नफरत का त्याग करें। वास्तविक जीवन में श्रीमद् भगवत गीता का बहुत महत्व है।
उन्होंने बांग्लादेश में हो रहे अत्याचार और मानव अधिकारों के हनन की कड़े शब्दों में निंदा की और स्पष्ट कहा कि यूएनओ सहित अन्य देशों को इस पर कड़ा संगठन लेकर वहां हो रहे अत्याचार और हिंसा को रुकवाना चाहिए। कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने कहा कि शांत मन हमें तनाव मुक्त आनंदमय जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। इस अवसर पर आरएसएस से प्रदीप शास्त्री, सत्यनारायण मित्तल, पूर्व सूचना आयुक्त भूपेंद्र धर्माणी, सुरेश पाल, विभाग प्रचारक जितेंद्र, सुभाष गोयल, विक्रम सिंह, वीरेंद्र कौशिक, डॉ. अश्वनी, पीआरओ प्रभारी ऋषि शर्मा, सुपरवाइजर रविंद्र शर्मा उपस्थित रहे।
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