भिवानी। एशिया में सबसे बड़े प्लास्टिक उद्योग के रूप में पहचान बनाने वाली भिवानी के हालात अब ऐसे है कि प्लास्टिक उद्योग बंद होने की कगार पर है। बारदाना बनाने वाली फैक्ट्रियों के साथ पीपी प्लांट भी बंद हो रहे है। पहले 40 से अधिक पीपी प्लांट होते थे। जिनसे प्रति माह 40 टन से अधिक का उत्पादन होता था, मगर अब बमुश्किल 22 प्लांट बचे है। इनका उत्पादन भी आधा ही रह गया है। उद्योगपति इसके लिए अव्यवस्थाओं, सरकार की पॉलिसी, बिजली निगम को दोषी मान रहे है।
कभी भिवानी की पहचान कहे जाने वाले प्लास्टिक उद्योग आज समस्याओं से घिरा है। समस्याएं एक नहीं अनेक। महंगे रॉ मैटीरियल से लेकर लेबर, महंगी मशीनें, कम जगह, बिजली बिल और अघोषित कट। इन अव्यवस्थाओं के कारण भिवानी का प्लास्टिक माल लगातार महंगा होता जा रहा है और अन्य राज्यों के माल से लगातार पिछड़ रहा है।
कभी था गुलजार, अपनी थी अलग पहचान
भिवानी का प्लास्टिक उद्योग कभी गुलजार होता था। करीब 40-42 पीपी प्लांट के अलावा करीब दो सौ प्लास्टिक दाना बनाने वाली इकाई थी। एक-एक पीपी प्लांट में 30 से 35 मजदूर काम करते थे। हर महीने भारी मात्रा में उत्पादन होता था। मगर अब दो सौ प्लास्टिक दाना बनाने वाली इकाइयों में से करीब डेढ़ सौ बंद है। पीपी प्लांट भी 22 ही बचे है और उनमें लेबर भी बमुश्किल 150 ही बची है।
बिजली के एक कट से एक यूनिट पर दो हजार का नुकसान
बिजली का एक-एक कट प्रत्येक यूनिट पर भारी पड़ता है। एक कट से एक यूनिट पर करीब दो हजार रुपये का नुकसान होता है। दरअसल प्लास्टिक दाना से धागा बनाते समय करीब 40 फीट ऊंचाई से लेयर चलती है और बिजली का कट लगते ही यह टूट जाती है। ऐसे में बीच में टूटा धागा बेकार हो जाता है। बिजली का एक कट भी उद्योगपतियों पर भारी पड़ता है। बिजली निगम की ओर से बिना किसी सूचना के कट लगाए जाते है। जिससे उद्यमी परेशान है।
बिजली निगम से अधिक खफा है उद्यमी
सरकार की टैक्स, वैट की नीतियों के साथ उद्यमियों में बिजली निगम की योजनाओं से भी रोष है। उद्यमियों ने बताया कि अब 150 रुपये प्रति किलोवाट के हिसाब से चार्ज फिक्स है। हर यूनिट का लोड कम से कम दो सौ किलोवाट का रहता है। यह फिक्स चार्ज के अलावा प्रति यूनिट साढ़े नौ रुपये बिजली बिल देना पड़ता है। पहले ऐसा नहीं था और फिक्स लोड की राशि की यूनिट खर्च करने के बाद ही बिल बनता था। अब फिक्स राशि के ऊपर प्रति यूनिट बिल बनता है। इसके अलावा अस्थायी कनेक्शन कटवाने या लोड कम करवाने के बाद दोबारा बढ़वाने पर सिक्योरिटी राशि प्रति किलोवाट फिर से देनी पड़ती है। हरियाणा में अन्य राज्यों से सबसे ज्यादा महंगी बिजली है।
साढ़े पांच करोड़ के प्रति माह के बिल, फिर भी खाते है धक्के
उद्यमियों ने बताया कि इंडस्ट्रीज एरिया के उद्यमी प्रति माह करीब साढ़े पांच करोड़ के बिल भरते है। इतनी बड़ी राशि बिल के रूप में भरने के बाद भी उन्हें कोई सुविधा नहीं मिल रही। यहां तो बिल भरने के लिए भी लाइन में लगकर धक्के खाने पड़ते है।
यहां तो कचरे पर भी टैक्स
शहर से दिनभर कचरा बिनने वाले लोग प्लास्टिक की बोतलें व अन्य सामान एकत्रित करते है और कबाड़ी के माध्यम से सारा माल दिल्ली भेजा जाता है। वहां से अलग अलग होकर माल वापस भिवानी आता है और उस प्लास्टिक से दाना बनता है। दिल्ली में यह टैक्स फ्री है। भिवानी में इसका भी टैक्स लगता है। इस कारण रॉ मैटीरियल महंगा पड़ता है। अगर यह टैक्स न लगे तो भिवानी में ही यह प्लास्टिक डंप होने की व्यवस्था हो सकती है और ट्रांसपोर्ट का खर्च बच सकता है। इससे उद्यमियों को भी रॉ मैटीरियल सस्ता मिलेगा।
क्या कहते है उद्यमी
बिजली निगम की खराब पॉलिसी ने उद्योग को बहुत प्रभावित किया है। कभी भी बिजली कट लग जाता है और लेयर टूट जाती है। अगर पहले सूचित किया जाए तो वे जनरेटर आदि से वैकल्पिक व्यवस्था कर ले और नुकसान न हो। अब तो भिवानी से प्लास्टिक उद्योग खत्म ही हो गया है। जिनके पास दो-दो मशीनरी है, वह एक-एक चला रहे है। जिनके पास एक है वह भी काफी समय तक अपनी मशीनरी को बंद ही रखता है।
विनोद शर्मा, उद्यमी, एडवांस पॉलीटेक
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बिजली निगम की पॉलिसी उद्यमियों पर भारी है। पिछले दिनों बिल बढ़ा दिए और वे भी अप्रैल से। अब अप्रैल से अब तक उन्होंने जो माल बेचा है, उसके दाम तो नहीं बढ़ सकते, जिस कारण काफी नुकसान हुआ। बिजली कट तो है ही समस्या। उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कोई ठोस पॉलिसी बनानी चाहिए।
कुलवंत सिंह, उद्यमी
ये व्यवस्थाएं हो तो बने बात
* बिजली के कट पहले से ही घोषित हो
* अन्य राज्यों की तर्ज पर कम रेट पर मिले बिजली, अस्थायी कनेक्शन जुड़वाने पर अलग से न लगे कोई सिक्योरिटी
* इंडस्ट्रीज एरिया में बिजली निगम का अस्थायी कार्यालय बनाकर बिल भरवाये जाए
* रॉ मैटीरियल पर टैक्स और वैट में छूट
* भिवानी में ही कचरा डंप करने की व्यवस्था हो
* नए मशीनों के सेटअप पर मिले सब्सिडी
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