रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी पाने के लिए संपन्न परिवारों के लोग भी लालायित हैं।
उधर, जिले के कई मध्यम वर्गीय ऐसे परिवारों ने सब्सिडी छोड़कर मिशाल कायम की है, जिनकी कुल आमदनी ही फकत 7-8 हजार रुपये मासिक है। पेंशन और किराए पर गुजारा करने वाले इन परिवारों ने सैकड़ों संपन्न और वीआईपी उपभोक्ताओं को शर्मशार कर दिया है।
आलीशान बंगलों और कोठियों में रहने वालों के लिए यह चंद उपभोक्ता नजीर हैं। महम गेट स्थित भारत गैस एजेंसी के शहर में कुल 14 हजार उपभोक्ता हैं। इनमें ज्यादातर संपन्न परिवार शामिल हैं।
तमाम जागरूकता अभियानों के बाद भी एजेंसी के महज 37 उपभोक्ताओं ने गैस सब्सिडी छोड़ी है। इसमें एक खुद एजेंसी मालिक भी शामिल हैं। पति की पेंशन पर गुजारा करने वाली विमला देवी ने भी सब्सिडी छोड़ी है। इनकी कुल मासिक आय करीब 8 हजार रुपए है।
दोनों बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे हैं। इनके अलावा आठ हजार रुपए की पगार पर काम करने वाली कमला देवी ने भी सब्सिडी छोड़ दी है। गणेशीलाल वर्मा को किराए से साढ़े सात हजार रुपए मिलते हैं, मगर इन्होंने भी गैस की सब्सिडी लेने से इनकार कर दिया है।
उपभोक्ता जयकिशन, रमेश कुमार, वीर सिंह, हरेन्द्र कुमार, रवीन्द्र कुमार आदि ने भी सब्सिडी लेने से इनकार कर दिया है। एजेंसी संचालक मदनलाल के मुताबिक सब्सिडी छोडने वालों में ज्यादातर सामान्य परिवारों के ही लोग हैं। किसी संपन्न परिवार के उपभोक्ता ने अभी सब्सिडी छोड़ने की सहमति नहीं जताई है।
कुछ ऐसा ही हाल है जाट धर्मशाला स्थित गैस एजेंसी का। शहर की सबसे बड़ी इस एजेंसी के 16 हजार उपभोक्ता हैं। यहां ज्यादातर उपभोक्ता रसूखदार परिवारों के हैं। इनमें महज 180 ने ही अब तक सब्सिडी छोडने की सहमति जताई है। गैस एजेंसी संचालक दिलबाग सिंह का कहना है कि मध्यमवर्गीय तबके ने ही सब्सिडी न लेने का फार्म भरा है।
इसलिए नहीं छोड़ रहे सब्सिडी
गैस सब्सिडी न छोड़ने के पीछे उपभोक्ता बड़े नेताओं, अफसरों की दलील दे रहे हैं। उनका कहना है कि जब लाखों रुपये के वेतन पाने वाले नेता, अफसर सब्सिडी नहीं छोड़ रहे तो वह क्यों छोड़ें। जब बड़े-बड़े लोग सब्सिडी के मजे लूट रहे हैं तो वह अपना हक क्यों छोड़ें। सरकार पहले मोटी तनख्वाह लेने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों से सब्सिडी छोड़वाए, फिर आम उपभोक्ता भी इसे बंद कर देंगे।
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देश में तमाम लोगों को अब भी जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं हो पा रही। अगर हमारे सब्सिडी छोड़ने से किसी का भला हो तो क्या हर्ज है। दूसरे क्या करते हैं, इसकी हमें चिंता नहीं है। हम बस राष्ट्र कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं। -विमला देवी, उपभोक्ता।
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देश की प्रगति के लिए हर व्यक्ति के नैतिक दायित्व हैं। इसे पूरा करने की बजाए दूसरों की नकल क्यों करें। हमें लगा कि सब्सिडी छोड़कर हम कुछ योगदान दे सकते हैं, इसलिए यह फैसला लिया। अन्य लोगों को भी इसके प्रति जागरूक होना चाहिए। -गणेशीलाल वर्मा, उपभोक्ता।
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