जूई। गैस सिलिंडर की तंगी के कारण शहर की गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी-लंबी कतारें नजर आने लगी हैं। वहीं गांवों के साथ अब शहरों में भी एक बार फिर पारंपरिक चूल्हे की अहमियत को बढ़ा दिया है। लकड़ी और उपलों के साथ चूल्हे पर धीमी आंच में पके खाने का स्वाद लोगों को खूब पसंद आने लगा है लेकिन यह परेशानी भी बढ़ा रहा है।
ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि पहले घर-घर में गैस कनेक्शन होने से खाना बनाना आसान था लेकिन कुछ दिनों से गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण उन्हें चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे न केवल खाना बनाने में अधिक समय लगता है बल्कि धुएं से आंखों में जलन और सांस लेने में भी परेशानी आने लगी है। बीरमती, कमला और देवकी ने बताया कि सुबह लकड़ियां व उपले इकट्ठा करने जाती हैं तभी खाना बन पाता है। कई महिलाएं खेतों और आसपास के इलाकों से लकड़ियां लाने के लिए भी मजबूर हैं। संवाद
उपले और लकड़ी की कीमत में इजाफा
गैस की तंगी का असर बाजार पर पड़ने लगा है। एजेंसियों के बाहर सिलिंडर के लिए भीड़ उमड़ने लगी हैं। वहीं पहले जो एक उपला एक से दो रुपये में मिलता था अब तीन से पांच रुपये में मिल रहा है। होटलों और ढाबों पर भी लकड़ी व कोयले की भट्ठी की मांग बढ़ गई है। कई छोटे होटल और ढाबा संचालक चूल्हों पर लकड़ियां जलाकर खाना बनाने को मजबूर हो गए हैं। अब लकड़ी और कोयले के दाम भी बढ़ गए हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन और एजेंसियों से आग्रह किया है कि रसोई गैस की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
बदल गई दिनचर्या, खाना पकाने में लग रहे दो घंटे
कविता ने बताया कि पहले गैस सिलिंडर पर खाना बनाने में लगभग पौने घंटे का समय लगता था लेकिन अब मिट्टी के चूल्हे पर उपलों से भोजन पकाने में करीब दो घंटे लग रहे हैं। अब उनकी दिनचर्या बदल गई है। सुबह नाश्ता बनाने के लिए जल्दी उठना पड़ता है और शाम को भी खाना बनाने में समय अधिक लगता है।
बिटोड़े बनाने में जुटीं महिलाएं
गांव की भतेरी, भरपाई और हरबाई ने बताया कि वे रोजाना गोबर से उपले बनाकर बिटोड़ा तैयार कर रही हैं। उपलों की बढ़ती मांग के कारण उनका काम और बढ़ गया है। अधिकांश घरों में महिलाएं गोबर के उपले नहीं बनाती और उन्हें खरीदकर इस्तेमाल करना पड़ता है जिससे एक बिटोड़ा भी काफी कीमती हो गया है।