जातीय आरक्षण का जिन्न शायद ही काबू में आ पाएगा। हिंसक आंदोलन के बाद जाटों को आरक्षण देने की घोषणा हुई तो जाट बिरादरी के चेहरे पर मुस्कुराहट दिखी तो दूसरे नाराज हो गए। दूसरा खेमा विरोध में तुरंत लामबंद हो गया और बोल भी तीखे सुनने को मिले। आदर्श समाज के नुमाइंदों ने यह तक ऐलान कर दिया कि आरक्षण के दायरे से बाहर जाति (ब्राह्मण, राजपूत, बनिया व पंजाबी) यदि आरक्षण मांगेंगी तो ओबीसी जातियां उनका साथ देंगी। जाट आरक्षण बिल के फौरन बाद जिस तरीके से प्रतिक्रिया आई है, उससे आने वाले दिनों में आरक्षण को लेकर और घमासान के आसार हैं। शासन और प्रशासन दोनों के लिए समाज में संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण होगा।
जाट समेत पांच बिरादरियों को आरक्षण दिए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर आदर्श समाज की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई है। समाज के नुमाइंदों ने खट्टर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और इस कदम को असंवैधानिक बताया। ऐलान भी किया कि वे सरकार के खिलाफ अदालत में अवमानना याचिका दायर करेंगे। पूरे हालात पर गुफ्तगू के लिए 17 अप्रैल को भिवानी में राज्यस्तरीय बैठक बुलाई है।
मंगलवार शाम दादरी गेट स्थित समाज के कार्यालय में हुई बैठक में जाट आरक्षण को मंजूरी देने के फैसले के बाद के हालात पर चर्चा हुई। बैठक की अध्यक्षता राजेंद्र तंवर ने की। बैठक के बाद समाज के नुमाइंदों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। राजेंद्र तंवर ने कहा कि मनोहरलाल खट्टर सरकार ने जिस केसी गुप्ता कमीशन की रिपोर्ट को आधार मानकर जाट समेत 6 जातियों को आरक्षण दिया है, वह गैर संवैधानिक व सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है। केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग खारिज कर चुका है और सुप्रीम कोर्ट ने भी उसको निरस्त कर दिया। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने भी उस पर स्टे दिया हुआ है। फिर किस आधार पर खट्टर सरकार ने जाट समेत 6 जातियों को आरक्षण दिया। इसी मामले को लेकर आदर्श समाज प्रदेश की खट्टर सरकार के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस दायर करेगा। उन्होंने सीएम पर घुटने टेकने का आरोप लगाया और कहा कि आग लगाओ-आरक्षण पाओ की नीति को सरकार ने स्वीकार कर लिया। अगर एक समाज को लठ के बल पर आरक्षण दिया गया तो ब्राह्मण, राजपूत, बनिया व पंजाबी अगर आरक्षण के लिए सड़कों पर आएंगे तो ओबीसी उनका साथ देगा। बैठक में अमन राघव, रमेश टांक, सुरेश सैनी, शिवकुमार प्रजापति, दिनेश बेडवाल, नवीन धमीजा, मुकेश सैनी, मदन वर्मा, सोनू सैनी, अमित परमार सरपंच, अनूप यादव, लालचंद जांगड़ा, अशोक राघव, जोगेंद्र शर्मा, विजय यादव आदि मौजूद रहे।
उधर खुश हुए जाट
हिंसक आंदोलन के बाद मिले आरक्षण से जाट बिरादरी खुश है। लेकिन, खुशी के साथ-साथ कुछ किंतु-परंतु भी हैं। अखिल भारतीय जाट संघर्ष समिति के प्रदेश अध्यक्ष रिटायर्ड कमांडेंट हवासिंह सांगवान ने कहा कि सरकार के फैसले पर संतुष्टि हैं, लेकिन कुछ चीजें और साफ होनी बाकी हैं। उन्होंने कहा कि नोटिफिकेशन में तीनों कैटेगरी एक होनी चाहिए। इसमें असमानता न हो। एडमिशन व नौकरी के अलावा बैकवर्ड क्लास की ए व बी कैटेगरी को जो लाभ मिलें, वे उन्हें भी मिलने चाहिए।
प्रदेश में जाट बिरादरी केवल कृषि कार्य पर निर्भर होने से आर्थिक हालात बहुत कमजोर हो चुकी है। मौजूदा स्थिति में आरक्षण मिलना जरूरी है। प्रदेश सकरार ने पहले कैबिनेट व आज विधानसभा में विधेयक से पास करवा कर ऐतिहासिक पहल की है जिसके लिए अपने हकों के शहादत देने वाले युवाओं की कुर्बानी को सलाम करेंगे और आजीवन उनके आभारी रहेंगे।
प्रदीप बाढड़ा, अध्यक्ष, जाट आरक्षण आंदोलन समिति
कैबिनेट द्वारा जाट समुदाय के लिए आरक्षण के लिए जो प्रारूप पेश किया है उस पर अभी मंथन किया जा रहा है। इस बारे में पूरी जानकारी लेने के बाद ही कुछ कहा जाएगा।
रामस्वरूप सिधनवा, प्रधान सर्वजातीय श्योराण खाप 84
फिर कोर्ट में देंगे चुनौती : मुरारीलाल गुप्ता
विगत में हाई कोर्ट में आरक्षण को चुनौती देने वाले भिवानी के मुरारीलाल गुप्ता को कहना है कि इस बार भी आरक्षण असंवैधानिक तरीके से पास किया गया है। इस पर स्टे है और कोर्ट में लंबित है, ऐसे में सरकार ने यह फैसला लिया है। वे इसे भी कोर्ट में चुनौती देंगे। वे अधिवक्ताओं से राय लेंगे। यदि अवमानना का केस बना तो वे सरकार पर मुकदमा करेंगे। बता दें कि मुरारीलाल गुप्ता की आरक्षण को लेकर दायर की गई याचिका पर 27 जुलाई 2015 को हाई कोर्ट ने स्टे दे रखा है। अभी यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
कानूनन तर्क संगत नहीं
वरिष्ठ अधिवक्ता कैप्टन पवन अंचल का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में निरस्त होने के बावजूद राज्य सरकार की ओर से जाट समेत पांच जातियों को आरक्षण देने का फैसला कानूनन तर्क संगत नहीं है। ऐसा लगता है कि कानूनी व संवैधानिक हिसाब से यह टिकने वाला नहीं है। किसी भी फारवर्ड जाति को बैकवर्ड जाति में शामिल करने के लिए राज्य पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट जरूरी होती है। लेकिन, सरकार ने उसी रिपोर्ट को आधार बनाकर उन्हीं पांचों जातियों को अलग वर्ग बनाकर आरक्षण दे दिया। यह कहीं से भी तर्क संगत नहीं लग रहा है। सरकार ने अपने बिल में 12 दिसंबर 2012 की रिपोर्ट की अनुशंसा का जिक्र तो कर दिया, लेकिन दिसंबर 2012 के बाद की कार्यवाही को तरीके से छिपा दिया। इसके बाद 17 मार्च 2015 को सुप्रीम कोर्ट जाट आरक्षण को खारिज कर चुका है।