शहर के मानानपाना निवासी शोधकर्ता डा. विभा भारद्वाज अर्जेंटीना में कचरा प्रबंधन पर काम करेंगी। अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनिस आरयस में पेपर, प्लास्टिक बॉयो-डिग्रेडेबल के लिए एक साल का करार किया गया है। 21 अगस्त को अर्जेंटीना के लिए उड़ान भरेगी। विभा करनाल स्थित सीएसएसआरआई में साइंटिस्ट हैं।
शोध के लिए वल्र्ड से चुने गए केवल 10 वैज्ञानिकों में से भारत से केवल डा. विभा का चयन किया गया। इसके लिए पहले मेरिट आधार पर, साक्षात्कार, टेस्ट में उत्कृष्ट रहने पर चयनित हुई। वर्ष 2004 में देहरादून से माइक्रोबायोलॉजी में स्नातक, 2008 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर व केयू से ही 2015 में माइक्रोबायोलॉजी में ही पीएचडी कर डाक्टरेट की डिग्री हासिल की। साथ ही करनाल के दयाल सिंह कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर भी अपनी सेवाएं दी।
अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में उनके द्वारा लिखित पुस्तकें बतौर सिलेबस पढ़ाई जाती है। इन पुस्तकों में वर्तमान व तात्कालिक रिसर्च के आधार पर पूरा चैप्टर लिखा जाता है। वहीं थर्माकोल से बनी वस्तुओं के प्रयोग से मानव शरीर पर होने वाले दुष्प्रभाव, कपड़े को अधिक समयावधि तक प्रयोग करने, पानी, एंटी कैंसर ड्रग, बायोडायवर्सिटी आदि पर शोध कर चुकी हैं।
इटली में जीका वायरस के लिए तैयार करेगी एंटी बायोटिक
अर्जेंटीना की राजधानी में अपने शोध को पूरा करने के बाद विभा इटली में जीका वायरस की दवा पर भी काम करेगी। विभा ने बताया कि इस बारे में इटली सरकार उससे संपर्क कर चुकी है। इसके अलावा स्वीडन में वेस्ट मैटेरियल के प्रयोग से बॉयोडीजल बनाने पर काम करने के लिए एंग्रीमेंट हो चुका है। इससे पहले 2010 में मलेशिया व 2014 में थाइलैंड में हुई इंटरनेशनल कांफ्रेस में बतौर साइंटिस्ट भाग ले चुकी है। वहीं नाइजीरिया, शिकागो में भी आमंत्रित किया गया। लेकिन व्यस्तता के कारण भाग नहीं ले सकी।
माता-पिता ने दिया हर कदम पर साथ
डा. विभा भारद्वाज का कहना है कि हर कदम पर मिले माता-पिता के सहयोग से ही उनकी मेहनत व प्रयास सफल हुए। पिता वेद पुजारी व माता निर्मल ने बचपन से ही चारों बहनों व भाई को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। बड़ी बहन ऋचा वशिष्ठ गुड़गांव में प्राध्यापक, छोटी बहन प्रेरणा न्यूजीलैंड में इंटीरियर डिजाइनर है, तो वहीं सबसे छोटी बहन क्षमा एमबीए, लॉ करने के बाद ज्यूडीसरी की तैयारी में जुटी है, व भाई अश्विनी आईएएस की तैयारी कर रहा है। माता-पिता ने बेटियों पर गर्व जताते हुए समाज में लोगों को बेटियों को लगातार बढने के लिए सहयोग व प्रेेरित करने को कहा।
सरकार से नहीं मिलती मदद
डा. विभा का कहना है कि देश में रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती। शोधार्थी को अपने पैसों से एक-एक केमिकल को टेस्ट करवाने व अन्य जरूरी उपकरण जुटाने पड़ते हैं। अपने शोध के दौरान खुद एक-एक टेस्ट, केमिकल के लिए 35 से 40 हजार रुपये खर्च किए। लैब में मिलने वाले रसायन आदि काफी निम्न स्तर के होते हैं, जिनका कभी प्रयोग ही नहीं हो पाता। इस बाबत चार-पांच साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सूचित किया था, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया।