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कुपोषण की चपेट में हैं पांच सौ बच्चे

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कुपोषण की चपेट में हैं पांच सौ बच्चे
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भिवानी। जिलेभर में लगभग पांच सौ बच्चे गंभीर किस्म के कुपोषण की चपेट में हैं। इन बच्चों की उम्र पांच साल से कम है और ज्यादातर बच्चे गरीब तबके से हैं। स्वास्थ्य विभाग ने विशेष अभियान के तहत ऐसे बच्चों की पहचान और इलाज शुरू किया है। इन बच्चों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में 10 बिस्तर का पोषण पुनर्वास केंद्र शुरू किया गया है।
चिकित्सा की भाषा में कहें तो जिलेभर में करीब पांच सौ बच्चे सीवियर एक्यूट मैल-न्यूट्रीशियन (एसएएम) की चपेट में हैं। ऐसे बच्चों को रेड जोन में माना गया है। यैलो जोन में वे बच्चे शामिल हैं, जो कुपोषण की चपेट में तो हैं, लेकिन स्थिति गंभीर नहीं है। महीने भर के दौरान ओपीडी में जांच के दौरान कुपोषण पीड़ित लगभग 50 बच्चों की पहचान हुई है। विभागीय सूत्र बताते हैं कि चार सौ से ज्यादा कुपोषण पीड़ित बच्चों की पहचान राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य विभाग की टीम ने की है।
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बाल रोग विशेषज्ञ डा. राज मेहता का कहना है कि रेड जोन में आने वाले बच्चों में मृत्यु दर तीन से चार गुणा ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे बच्चों में छोटी-सी बीमारी भी जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए, इन बच्चों पर खास ध्यान दिए जाने की जरूरत है। कुपोषण पीड़ित बच्चों का वजन व लंबाई औसत बच्चों की तुलना में काफी कम होती है।
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इसलिए कुपोषण से पीड़ित हैं नौनिहाल
ज्यादातर बच्चे गरीबी की वजह से कुपोषण से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों के माता-पिता अच्छी डाइट देने में समर्थ नहीं होते। बच्चों का लंबे समय तक बीमार रहना या निमोनिया का लंबा खिंचना, कुपोषण की दूसरी बड़ी वजह है। अज्ञानता भी कुपोषण की बड़ा कारण है।
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कुपोषण पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए स्पेशल वार्ड
कुपोषण पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए स्वास्थ्य विभाग ने जिला अस्पताल के वार्ड नंबर आठ में पोषण पुनर्वास केंद्र की बनाया है। इसमें दस बच्चों को एडमिट किया जा सकता है। बच्चों को माहौल देने के लिए विभाग ने पूरे वार्ड में दीवारों पर कार्टून बनवाए हैं। वार्ड में उपचाराधीन बच्चों को जरूरत के हिसाब से विभाग डाइट देगा। डाइट में दूध, दलिया से लेकर एनर्जी फूड, प्रोटीन व कैलोरी दी जाती है।
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माता या पिता को सौ रुपये प्रतिदिन देगा विभाग
कुपोषण पीड़ित बच्चे को पोषण पुर्नवास केंद्र में भर्ती किया जाता है तो बच्चे की देखरेख करने वाले माता-पिता में से एक को सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से राशि भी दी जाती है। सीएमओ डा. रणदीप सिंह पूनिया ने बताया कि यह राशि इसलिए दी जाती है ताकि माता-पिता मजदूरी की चिंता किए बगैर बच्चे की रेख रेख कर सकें।
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