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रुख्सत-ए-जहां हुए वाहिद...अपनी लेखनी से दिलों में रहेंगे जिंदा

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स्वामी वाहिद काजमी की फाइल फोटो - फोटो : Ambala
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सुविख्यात साहित्यकार स्वामी वाहिद काजमी (76) का शनिवार सुबह निधन हो गया। वह फरवरी में कोरोना से तो जंग जीत गए थे। मगर उसके बाद से उनकी तबीयत कुछ नासाज़ रहने लगी थी। लगातार कमजोरी की वजह से वे अस्वस्थ थे और शनिवार को वाहिद दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने आखिरी सांस रेडक्रास सोसायटी के वृद्धा आश्रम में ली। भले ही वाहिद चले गए, मगर अपनी लेखनी से वह अपने चाहने वालों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।
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लीक से हटकर विषयों पर लिखने वाले वाहिद हमेशा युवा लेखकों व साहित्यकारों के लिए प्रेरणा रहे। यही कारण रहा कि उनके जनाजे में न केवल मुस्लिम बल्कि हिंदू व सिख धर्म के युवाओं व अन्य लोग भी शामिल हुए। शोध विषय और समाज को आइना दिखाने वाली सच्ची घटनाओं पर उन्होंने सबसे ज्यादा काम किया है। उनकी एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी ‘लानत’ व उनकी जीवनी आज भी केरल विश्वविद्यालय में स्नातक के छात्रों की अंग्रेजी पुस्तक ‘रीडिंग एंड रियलिटी’ का हिस्सा है।
काका हाथरसी के बेटे डा. लक्ष्मीकांत गर्ग ने बताया कि सुनने में अक्षम होने के बावजूद संगीत विषय पर उनका लेखन बहुत ही दमदार था। इसी वजह से उन्हें संगीत अमृत महोत्सव में ‘संगीत मर्मज्ञ’ की उपाधि से भी नवाजा गया था। इसके अलावा भी वे अंबाला की विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं। इसके साथ-साथ हरियाणा सरकार का 10 बड़े खंडों में विभक्त एक महत्वपूर्ण साहित्य ‘हरियाणा इनसाइक्लोपीडिया’ में भी उनका योगदान रहा। इसके लिए न केवल उन्होंने लिखा, बल्कि वह एक खंड की परामर्श समिति के सदस्य भी रहे। हरियाणा सरकार ने उन्हें इसके लिए प्रशंसा पत्र भी दिया।
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उनकी मुंह बोली बेटी डा. वंदना मुकेश ने बताया कि वाहिद काजमी जैसी शख्सियत का चले जाना साहित्य जगत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। उनके मार्गदर्शन में कई युवा छात्रों ने साहित्य से जुड़े विभिन्न विषयों में अपनी पीएचडी पूरी की। वाहिद उनकी पीएचडी के दौरान कई शोध विषयों पर उनकी मदद करते थे। वाहिद काजमी का अपने नाम के आगे स्वामी लगाने का वाक्या भी बढ़ा रोचक है। वह कोई स्वामी नहीं थे, बल्कि वे सिर्फ नाम के आगे इसलिए स्वामी लगाते थे, ताकि वे अपने नाम की वजह से हमेशा हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए हमेशा चहेते बने रहे। मूल रूप से ग्वालियर के आंतरी कस्बे के रहने वाले स्वामी वाहिद काजमी पिछले करीब 22 सालों से अकेले ही अंबाला में रहे थे। उनकी ‘सिने संगीत’ पुस्तक भी विशेष वर्ग के लिए लोकप्रिय रही। इसमें उनकी सिने संगीत पर गूढ़ शोध लेख शामिल थे। शनिवार को उनके निधन के बाद जामा मसजिद के इमाम मौलाना असगर कासमी ने विभिन्न लोगों की मौजूदगी में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक करवाया।
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यह हैं उपलब्धियां
- संगीत साहित्य पर 250 से अधिक लेख लिखे और प्रकाशित हुए।
- हरियाणा की संस्कृति पर लिखे शोध लेखों को हरियाणा इनसाइक्लोपीडिया के साहित्यिक खंडों में शामिल भी किया गया।
- राज्यपाल से उन्हें सम्मान भी मिल चुका है जोकि हरियाणा फार साइक्लोपीडिया में उनके अहम योगदान के लिए मिला था
- 160 शोध लेख, 550 लेख, 370 से अधिक कहानियां, 150 व्यंग्य व संस्मरण, 50 एतिहासिक विषयों पर लेख, 200 उर्दू उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद
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