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Ambala News: तीन पीढि़यों से कर रहे देशसेवा, युवाओं को देते हैं प्रेरणा

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अंबाला छावनी के प्रभु प्रेम पुरम में रहने वाली तीन पीढि़यां। संवाद
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अंबाला। तीन पीढि़यां लगभग 60 वर्षों से देश की सेवा में जुटी हैं। छावनी के प्रभु प्रेम पुरम निवासी बलदेव सिंह फौज की एक यूनिट में टेलर का काम देखते रहे। उनके बेटा परमजीत सिंह ने पैरा यूनिट का हिस्सा बनकर कमांडो का फर्ज निभाया और अब उनका बेटा फतेह सिंह सीआरपीएफ में उप निरीक्षक के पद पर देश सेवा कर रहा है।
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यह पीढ़ी अपने क्षेत्र में युवाओं के लिए भी मिसाल बन चुकी है। युवाओं को देश सेवा करने के लिए दादा, बेटा और पोता भी प्रेरित करते हैं। बलदेव सिंह ने फौज के समय की बातों को याद करते हुए बताया कि उनका जन्म 1947 में हुआ थ। स्कूली शिक्षा के दौरान उन्हें देश सेवा की कहानियां सुनने को मिलती थी। मात्र 14 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने फौज में नौकरी करने का फैसला कर लिया। उन्हें एक यूनिट में टेलर का काम मिला।
यूनिट जहां-जहां जाती वो यूनिट के साथ-साथ अपना सफर जारी रखते। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर देश के सभी हिस्सों में अपनी सेवाएं दी। उन्होंने बताया कि वर्ष 1962 में चीन युद्ध और 1971 में बांग्लादेश को लेकर पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई भी उनके आंखों के सामने हुई। उस समय भी देश सेवा को लेकर जो जोश व जज्बा होता था, वो आज भी हमारे देश के वीर जवानों में देखने को मिलता है। उन्होंने बताया कि 1963 से लेकर 1988 तक वो सेना से जुड़े रहे और इसके बाद सेवानिवृत होकर वो अंबाला आ गए।
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पिता को देखकर मिली प्रेरणा
पैरा कमांडो के तौर पर देश की सेना में अहम भूमिका निभाने वाले बलदेव सिंह के बेटे परमजीत सिंह ने बताया कि पिता काफी समय से सेना के साथ जुड़े रहे। उनकी पोस्टिंग के दौरान जम्मू-कश्मीर से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने का मौका मिला। उन्हें देखकर ही मन में हौसला पैदा हुआ कि मैं भी देश सेवा करूंगा। 1988 में पैरा कमांडो के तौर पर अपनी सेवाएं शुरू की। वर्ष 2009 में वो सेवानिवृत होकर अंबाला आ गए।
दादा और पिता को देख फोर्स में आया
सीआरपीएफ में सहायक उप निरीक्षक के तौर पर तैनात फतेह सिंह ने बताया कि बचपन में दादा और पोते का देखता था तो वो हमेशा फौज की बातें किया करते थे। दादा ने 1962 और 1971 में हुए युद्ध की दास्तां सुनाई थी कि किस प्रकार फौज के जवानों ने विपरीत परिस्थितियों में अपना मोर्चा नहीं छोड़ा और जान की परवाह न करते हुए दोनों युद्ध में जीत हासिल की। वहीं पापा बताते हैं कि पैरा कमांडो देश की उन विशेष यूनिटों में गिनी जाती है जो गंभीर हालातों से जूझने में काफी कारगर साबित होती है। इस यूनिट को सिर्फ ये ही सिखाया जाता है कि जान दो या फिर जान लो। उनकी प्रेरणा से ही आज सीआरपीएफ में सहायक निरीक्षक के तौर पर ओडिसा में देश सेवा कर रहा हूं।
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