कैंट में पंचदेव मंदिर में पांच दिवसीय भगवान शिव कथा के द्वितीय दिवस प्रवचन करते हुए साध्वी। प्र
अंबाला। पंचदेव मंदिर में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से आयोजित पांच दिवसीय भगवान शिव कथा के द्वितीय दिवस का आयोजन किया गया। कथा में आशुतोष महाराज की शिष्या सतप्रेमा भारती ने कहा कि माता सती ने जब भगवान शिव को नर रूप धारण कर लीला कर रहे प्रभु राम को देखा तो संदेह ग्रस्त हो जाती है कि जो अजन्मा है, अविनाशी है वह नर रूप में कैसे हो सकता है और अगर यह भगवान है तो इन्हें यह नहीं पता कि इनकी पत्नी को कौन ले गया है। जब भगवान शिव ने इन्हें प्रभु की परीक्षा के लिए भेजा तो सती ने माता सीता का रूप धारण कर लिया, लेकिन प्रभु उन्हें झट से पहचान लेते हैं।
साध्वी ने बताया कि यह बात परम सत्य है कि संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहां परमात्मा का वास न हो। साध्वी ने बताया कि प्रहलाद की रक्षा के लिए प्रभु का एक खंभे से प्रकट होना यह सिद्ध करता है कि वह जड़ चेतन सभी में है। जैसे जल धरती के नीचे व वायुमंडल में व्याप्त रहता है, लेकिन प्यास बुझाने के लिए हमें एक स्त्रोत के पास जाना पड़ता है। जहां पर पानी प्रकट है। वैसे ही चाहे ईश्वर सर्वव्यापी है, लेकिन हमारे महापुरुषों ने कहा है कि उसके प्रकट होने का, देखने का स्थान सिर्फ मानव का अंतकरण है। जैसे सूर्य का प्रकाश सर्वत्र छाया हुआ है, लेकिन एक दृष्टिहीन के लिए वह कहीं नहीं है। उसे देखने के लिए सर्वप्रथम तो उसे एक चिकित्सक चाहिए, दृष्टि चाहिए। उसी प्रकार ईश्वर जिज्ञासु को भी उसे देखने के लिए पहले एक सतगुरु की आवश्यकता है। अंतरदृष्टि की आवश्यकता है। जिसके द्वारा वह अंतहृदय में दर्शन कर पाए। उसके बाद ईश्वर अपने आप हर ओर प्रकाशित होगा। कथा का समापन प्रभु की आरती से किया गया।
कैंट में पंचदेव मंदिर में पांच दिवसीय भगवान शिव कथा के द्वितीय दिवस प्रवचन करते हुए साध्वी। प्र