अंबाला सिटी। सिटी के सेक्टर नौ स्थित अग्रवाल भवन में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में साक्षी गोपाल दास ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि इंद्र देवता ने अपने पुरोहित विश्वरूप गुरु का वध कर दिया था। इस कारण इंद्र को एक साल तक ब्रह्महत्या का पाप लगा रहा। जब त्वष्टा ऋषि को यह पता चला कि इंद्र ने उनके पुत्र का वध कर दिया तब त्वष्टा ऋषि ने एक यज्ञ किया।
उस यज्ञ से एक पुरुष प्रकट हुआ जिसका नाम वृत्रासुर रखा गया। वह इतना बलवान था कि सृष्टि के सारे अस्त्र शस्त्रों को निगल जाता था। तब देवताओं ने एकत्रित होकर भगवान को पुकारा। भगवान देवताओं के सामने प्रकट हो गए। देवताओं ने भगवान से प्रार्थना की, जिस पर वे खुश हो गए। भगवान बोले, हे देवताओं तुमने मेरी आराधना करके मुझे अति प्रसन्न किया है। जो मेरी भक्ति करता है, उसे मैं बुद्धि देता हूं। भगवान बोले- जो पाप करते हैं, उन्हें पापों का भुगतान करना पड़ता है। यदि हमें अपना सोया हुआ भाग्य जगाना है तो भगवान की भक्ति करनी पड़ेगी।
भगवान ने कहा कि तुम दधीचि ऋषि के पास जाकर उनसे उनका शरीर मांग लो, उन्हें ब्रह्म ज्ञान प्रदान है। देवता ऋषि के पास गए और उनसे प्रार्थना करके शरीर मांगा। दधीचि ऋषि बोले, क्या शरीर देने की वस्तु है। तुम्हारी बुद्धि मारी गई है तो देवता बोले कि जो अज्ञानी जीव है वह शरीर को सब कुछ मानते हैं पर आप तो ज्ञानी ब्रह्मज्ञानी हैं। आप भी अपने शरीर से आसक्ति रखते हो। ऋषि बोले, मैंने तुम से धर्म का उपदेश सुनने के लिए ही तो तुम्हें शरीर देने से मना किया। जो अपने धन व शरीर को भगवान में नहीं लगाते हैं वह मूर्ख हैं इसलिए अपने धन व शरीर को भगवान में लगाना चाहिए।
बैकुंठ की प्राप्ति करने के लिए अपने धन व शरीर को भगवान में नहीं लगाना चाहिए। भगवान की भक्ति करने वाले सभी जीव भगवान के प्रिय होते हैं। भगवान की भक्ति से ही कष्टों का निर्वाण होता है इसलिए अपने आपको भगवान के प्रति निस्वार्थ सेवा भाव से समर्पित करना चाहिए।