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श्रीमद्भागवत कलियुग में भवसागर से पार लगाने की नैय्या

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नारायणगढ़। गांव नन्हेड़ा में युवा एकता संगठन और गांव वासियों द्वारा श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन करवाया जा रहा है। कथा के दूसरे दिन राष्ट्रीय कथा व्यास पुष्प मुरारी बापू ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा इस कलियुग में भवसागर से पार लगाने की एक नैय्या है। उन्होंने कहा कि जब माता भक्ति के पुत्र ज्ञान और वैराग्य को अचेत अवस्था से चेतना में लाने के सभी प्रयास विफल होते दिखे तब नारद देव योग से वहां आए। इसके बाद आकाशवाणी ने उन्हें इनकी चेतना के लिए सत्य कर्म करने का ज्ञान दिया। नारद की सत्य कर्म की खोज के दौरान बद्रीका आश्रम में, सनक, सनदन, सनत कुमार से भेंट हुई। उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा को सत्य कर्म बताया व नारद के कथा सुनने से ज्ञान और वैराग्य पुन: युवावस्था को प्राप्त हो गए।
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मुरारी बापू ने श्रीमद्भागवत के रचयिता महर्षि शुकदेव के जन्म की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि माता पार्वती के अनुरोध पर महादेव जब माता को अमर कथा सुना रहे थे तब कथा के बीच में माता पार्वती को नींद की झपकी आ गई। भगवान शिव को इसका पता नहीं चला। जब माता की नींद खुली तो नींद आने के कारण पुन: कथा सुनाने का अनुरोध किया। इस पर महादेव शिव ने कहा कि कथा सुनने की आवाज फिर कौन दे रहा था। वास्तव में उस समय माता पार्वती के अतिरिक्त तीन प्राणी कथा सुन रहे थे।
कबूतर-कबूतरी का जोड़ा और एक तोता। भगवान शंकर के क्रोध से डरकर तोता उड़ कर भागने लगा तो महादेव उसके पीछे चले गए। महर्षि वेदव्यास की पत्नी बिटिका देव योग से जम्हाई ले रही थी तो तोते ने उनके मुंह में प्रवेश कर लिया और 12 वर्ष बाद गर्भ से जन्म लिया। बापू ने बताया कि शुकदेव मृत्यु लोक में जन्म नहीं लेना चाहते थे, उन्होंने अमर कथा सुन ली थी। श्री शिव उन्हें मार नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने जन्म लेते ही अपने जन्म संस्कार पूर्ण किए और अपनी ओल नोल लपेट कर जंगल में चले गए।
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