अंबाला। छावनी के बीपीएस प्लेनेटेरियम में इस्कॉन कुरुक्षेत्र की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास साक्षी गोपाल दास ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य है। जो मेरी भक्ति करता है तो वह पुनर्जन्म नहीं लेता, अपितु वह भगवत धाम अर्थात मेरे गोलोक को प्राप्त करता है।
कृष्ण से बढ़कर कोई नहीं हैं। बताया कि महाराज परिक्षित ने जब कन्या को जेल से लाकर कंस को दिया। इसके बाद कंस ने जैसे ही देखा कि यह तो कन्या है, तब घबराए कंस ने उस कन्या को मारने के लिए ज्यों ही पटकने लगा वह उसके हाथ से वह छूट गई और अष्टभुजा का रूप धारण कर बोली, तू मुझे क्या मारेगा, तुझे मारने वाला कहीं और पैदा हो गया है।
इसके अगले दिन कंस ने अपनी असुरों की सभा बुलाई, तब कंस को भयभीत देख कर पूतना नामक राक्षसी आगे आई ओर बोली कि वह बृज में पिछले सात दिनों में जहां भी बच्चे पैदा हुए हैं, वहां जाकर सबको मार देगी। इस प्रकार पूतना ने न जाने कितने नवजात बच्चों को मार दिया।
इसके बाद नंद महाराज ने अपने पुत्र का जन्मोत्सव मनाया तो पूतना वहां पर पहुंच गई। उस समय कृष्ण छह दिन के थे। नवजात कृष्ण को लेकर पूतना हवा में उड़ गई।
तब पूतना ने अपने जहर लेपन वाले स्तन से कृष्ण को दूध पिलाना शुरू कर दिया। तब कृष्ण ने पहले पूतना का दूध पिया। इसके बाद पूतना के प्राण पीने लगे। यह देख पूतना बोली छोड़ दो। तब वैष्णवचार्य कहते हैं कि कृष्ण या तो पकड़ते नहीं और अगर पकड़ ले तो छोड़ते नहीं। तब भगवान कृ़ष्ण ने उसके प्राण पीकर उसे अपने लोक में अपनी माता के स्थान वाली मुक्ति दी।