केंद्र सरकार द्वारा सोमवार को आम बजट पेश किया जाना है, जिसके लिए जनता को काफी उम्मीदें हैं। जनता के लिए सबसे अहम जहां महंगाई व बच्चों की शिक्षा है, वहीं युवा वर्ग रोजगार व आशियाने को लेकर उम्मीदें लगाए बैठे हैं। यह वे उम्मीदें हैं, जिससे जनता को हर साल आस रहती है।
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महंगाई से मिले निजात
सबसे ज्यादा जनता महंगाई से त्रस्त है और इसी पर नियंत्रण चाहती है। खुली मार्केट में प्राइस कंट्रोल न होने के कारण लोगों को खाने पीने की वस्तुएं सस्ती उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। यही कारण है कि अधिकतर वस्तुओं के दाम आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रहे हैं। सरकार की ओर से ऐसी कोई योजना अभी तक नहीं दी गई कि ओपन मार्केट में हर वस्तु के दाम फिक्स किए जा सकें।
यह कहते हैं लोग
अंबाला के रहने वाले जोध सिंह, मलकीत सिंह, जसपाल सिंह कहते हैं कि महंगाई का असर हर वर्ग पर है, किसी पर कम है तो किसी पर ज्यादा है। खाद्य पदार्थों के रेट कभी फिक्स नहीं होते, जबकि सरकारें कागजी आंकड़ों में महंगाई को मात देने की कोशिशों में है। मध्यम या इससे कमजोर वर्गों के लिए महंगाई को देखते हुए राहत दी जा रही हैं, उनका लाभ जनता तक नहीं पहुंचता। इस पर सरकार कुछ करे ताकि जनता को महंगाई से तो राहत मिले।
यह आती हैं समस्याएं
- नौकरीपेशा लोगों को सीमित आए के चलते बजट में बदलाव करना पड़ता है
- दिहाड़ीदार मजदूर वर्ग के लिए महंगाई में घर का बजट तय करना मुश्किल है
- महंगाई का सीधा असर रसोई पर पड़ता है, जिससे घर का पूरा बजट बिगड़ जाता है
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बच्चों को मिले क्वालिटी एजुकेशन
बच्चों के लिए क्वालिटी एजुकेशन अभिभावकों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। खासकर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए तो यह काफी मुश्किल होता जा रहा है। क्वालिटी एजुकेशन के नाम पर खुली शिक्षा की दुकानें मध्यम वर्गीय परिवारों के बूते से बाहर हो रही हैं। इस पर आज तक सरकार रोक नहीं लगा पाई, जबकि कार्रवाई के कागजी दावे हर बार किए जाते हैं। सरकारी स्कूलों की स्थिति पर भी काबू पाया जाए, ताकि शिक्षा के मामले में निजी और सरकारी स्कूलों के अंतर को खत्म किया जा सके।
यह कहते हैं अभिभावक
अंबाला के अजय गुप्ता, राजेश कुमार, स्नेहपाल धीमान, पंकज बत्रा का कहना है कि शिक्षा के लिए आम बजट में कुछ ऐसा प्रावधान कियाजाए कि सरकारी और निजी स्कूलों में शिक्षा का एक ही पैट्रन लागू हो। साथ ही सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणाम पर ही अध्यापकों, प्रिंसिपल आदि की जवाबदेही भी तय की जाए। सबसे अहम निजी स्कूलों की फीस आदि पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार कुछ दिशा निर्देश भी जारी करे और सख्ती से अमल किया जाए।
यह है समस्याएं
- योजनाएं दी जाती हैं, लेकिन इनका लाभ विद्यार्थियों तक नहीं पहुंचता
- निजी स्कूलों की फीस आदि पर कोई नियंत्रण नहीं है, जबकि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का बुरा हाल
- सरकारी स्कूलों से लोगों का हो रहा है मोहभंग
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रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं
युवाओं के लिए सबसे अहम शिक्षा हासिल करने के बाद रोजगार की है। इसी में सरकारी दावे कुछ और कहते हैं, जबकि हकीकत कुछ और है। सरकारी सेवाओं में पद खाली हैं, जबकि सरकार इस मुद्दे को चुनावी बनाकर भुनाने के प्रयास में रहती है। वर्तमान में प्राइवेट सेक्टर में जहां बेरोजगार कम वेतन को लेकर परेशान हैं, वहीं सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार से परेशान हैं।
यह कहते हैं युवा
कैंट के रहने वाले कुमार प्रशांत, रवि कनौजिया, इंप्रीत सिंह का कहना है कि सरकार बेरोजगारों के लिए योजनाएं तो चलाती है, लेकिन इसके बाद कागजी स्तर पर मॉनीटरिंग शुरु हो जाती है। ऐसी योजनाओं पर सरकार ईमानदारी से काम करे और अधिकारियों व कर्मचारियों पर भी सरकारी योजनाओं को लागू करने के लिए इन पर मॉनीटरिंग की जाए। न्यूनतम वेतन सहित अन्य विसंगतियों को भी ईमानदारी से दूर करे।
यह हैं समस्याएं
- प्राइवेट नौकरियों में न्यूनतम वेतन का प्रावधान है, लेकिन पूरा वेतन नहीं मिलता
- बेरोजगार भत्ते में होती है धांधलियां, पात्रों को नहीं मिलता लाभ
- रोजगार योजनाओं को प्राइवेट कंपनियों के साथ टाइअप कर लागू किया जाए
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आवास योजनाओं पर तेजी हो
हर बजट में सरकार बेघरों के लिए आवास योजनाएं शुरु करती है। इसके लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं लोगों को समय रहते लाभ नहीं दे पाती। इसी करण से आवास योजनाएं अधर में लटकती हैं, जबकि आम जनता इन योजनाओं के पूरा होने का इंतजार ही करता रहता है। यह कहते हैं लोग
कैंट के रहने वाले राजीव गुप्ता, अजय कुमार, अशोक, राम सिंह, मनीष भारद्वाज का कहना है कि आवास योजनाओं में स्थानीय स्तर पर प्राइवेट बिल्डर्स को शामिल किया जाना चाहिए। कुछ जिलों के कलस्टर बनाकर ऐसी योजनाओं को तेजी से विकसित किया जा सकता है। लेकिन इस में भी तय समय सीमा में योजनाओं को पूरा करने की शर्त रखी जाए, तभी आवास योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक पहुंच सकता है, नहीं तो इंतजार लंबा होता है।
यह हैं समस्याएं
- आवास योजनाएं पूरी होने में लगती है देरी
- फाइलों में लटकी रहती हैं योजनाएं, नहीं मिलता फायदा
- बैंकों से आवास ऋण की प्रक्रिया है जटिल, नहीं मिलता लाभ