कृषि कानूनों को लेकर चल रहा किसान आंदोलन अब सियासती रंग में रंगता नजर आ रहा है। विपक्ष अब इस मुद्दे को अपनी पार्टी के मुद्दों में सबसे ऊपर रख कर राजनीति में उतर पड़ा है। इसका एक नजारा उस समय देखने को मिला जब कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा ने शंभू बार्डर पर पहुंच मंच से एलान किया कि अगर हमारी सरकार आती है तो इन कृषि कानूनों को वापस ले लिया जाएगा। किसानों को अपना समर्थन देते हुए उन्होंने सरकार के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली।
सैलजा ने कहा कि सरकार ने एक तरफ कोरोना-कोरोना का हल्ला मचाते हुए दूसरी तरफ चुपचाप ही कृषि कानूनों को लागू कर दिया। कृषि कानून बनाने से पहले सरकार ने किसी भी किसान से बात नहीं की। अगर की भी है तो वह भी केवल अडानी-अंबानी से। जिसके विचारों को उन्होंने कानून का रूप देते हुए किसानों पर थोप दिया। हमारा कृषि कानूनों के विरोध में सरकार के साथ पूरा समर्थन है। जब तक सरकार इन कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती हमारा हर कार्यकर्ता किसानों के साथ खड़ा है। इस दौरान भाकियू के उप प्रधान गुलाब सिंह ने सरकार को फिर से चेताया कि जब तक सरकार इन कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती है, हर एक किसान शंभू बार्डर और दिल्ली बार्डर पर डटा रहेगा और तब तक वापस नहीं जाएगा। जब तक सरकार इन कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती है।
हम नहीं, सरकार किसानों के साथ कर रही है साजिश
सैलजा ने कहा कि हम नहीं बल्कि सरकार किसानों के साथ साजिश कर रही है, क्योंकि सरकार मनमर्जी की राह पर चल रही है, क्योंकि बाद में जो भी पूंजीपति फसलों की कीमत तय करेंगे किसानों को चाहे घाटे में ही सही अपनी फसल को बेचना पड़ेगा। इसके बाद मुनाफाखोरी, जमाखोरी जो कि इस समय पूंजीपति बहुत ही छुप-छुप कर करते हैं। उसके लिए सरकार सीधे ही रास्ते खोल रही है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार तो यह कानून भी ला रही थी कि आंदोलन में जो भी नुकसान होगा। उसकी भरपाई आंदोलनकारियों से ही की जाए। लेकिन कांग्रेस विधायकों ने इसका विरोध किया है। कांग्रेस ने जो अविश्वास प्रस्ताव लाया था, उससे स्पष्ट हो गया है कि कौन किसानों का हितैषी है और कौन उनके अहित में है। किसानों को यह समझ लेना चाहिए और उसके साथ खड़ा होना चाहिए।