फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मरीजों से दूर हो रही हैं सस्ती दवाइयां, इलाज महंगा

Fri, 10 Feb 2017 12:48 AM IST
Ambala
विज्ञापन
विज्ञापन
अंबाला कैंट। सस्ती दवाओं की डोज मरीजों से दूर होती जा रही है। प्राइवेट में इलाज महंगा होता जा रहा है। सस्ती दवाओं यानी जेनरिक मेडिसन को लेकर मार्केट में न तो जागरूकता है, जबकि अंबाला में ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले जेनरिक दवाओं का बाजार लगभग पंद्रह से बीस प्रतिशत ही है। यही कारण है कि मरीजों के लिए इलाज करवाना काफी महंगा होता जा रहा है। 
विज्ञापन


यह है स्थिति 
अंबाला में स्वास्थ्य सेवाएं तीन हिस्सों (सिविल अस्पताल, निजी अस्पताल व क्लीनिक) में बंटी हैं। सिविल अस्पताल में तो मरीजों को सस्ती यानी जेनरिक डिवीजन की दवाइयां निशुल्क दी जा रही हैं, लेकिन निजी अस्पताल व क्लीनिक से मरीजों को ब्रांडेड दवाओं की प्रिस्क्रिप्शन लिखकर दी जा रही है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी प्रतिनिधि एक पूरे मार्केट प्लान के साथ निजी अस्पतालों व क्लीनिकों तक अपनी पहुंच बना चुके हैं। इसके साथ ही मार्केट में केमिस्ट शॉप्स तक भी यह प्रतिनिधि अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं। दूसरी ओर जेनरिक डिवीजन की दवाइयों की पकड़ मार्केट में अभी तक पूरी तरह से नहीं बन पाई है। 

नहीं बढ़ रहीं जेनरिक दवाएं
- निजी अस्पतालों व क्लीनिकों द्वारा ब्रांडेड दवाएं लिखी जाती हैं
- लोगों में भ्रम है कि महंगी दवाइयां मरीज को जल्द ठीक करती हैं
- जिलों में जेनरिक डिविजन की दवाइयों की खास दुकान ही नहीं हैं
- ब्रांडेड दवाओं की मार्केटिंग जेनरिक दवाओं पर भारी पड़ रही है
- मरीज भी डॉक्टर से जेनरिक दवाएं लिखने को नहीं कहते
- डाक्टर कौन सी दवा लिखे, इस पर कोई निर्देश नहीं हैं 
- मरीजों या तीमारदारों को नहीं पता जेनरिक से खर्च कई गुणा कम होगा 

यह कहते हैं लोग 
सस्ती दवाओं की बात तो की जाती है, लेकिन व्यवस्थाएं नहीं दी जातीं। सस्ती दवाएं ज्यादातर सिविल अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं, जबकि ओपन मार्केट में यह शाप्स नहीं हैं, जहां पर ऐसी दवाएं मिल सकें। योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन धरातल पर इनको उतारा नहीं जाता। 
विज्ञापन

- सुनील ठाकुर, समाज सेवी 

जेनरिक दवाओं को यदि मार्केट में प्रमोट किया जाए, तो मरीजों का दवाओं पर होने वाला खर्च कई गुणा कम हो जाएगा। दूसरी ओर निजी अस्पताल व क्लीनिक पूरी तरह से ब्रांडेड दवाओं को ही लिखते हैं। इसके कारण मरीजों पर बोझ बढ़ता है। 
- स्नेहपाल, नौकरीपेशा

जेनरिक दवाइयां क्या होती हैं, इस के बारे में पता नहीं है। डॉक्टर जो भी दवा लिखकर देते हैं, वह ले ली जाती है। इलाज तो करवाना ही है, जबकि दवा के लिए रुपयों का बंदोबस्त तो करना ही होता है। केमिस्ट शाप से भी जो दवा थमा दी जाती है वह ले लेते हैं। 
- अमरीक सिंह, कारपेंटर 

काफी साल पहले अंबाला कैंट सिविल अस्पताल में सस्ती दवाओं की शॉप खोलने की योजना बनी थी, जबकि इसका क्या हुआ कुछ पता नहीं चला। मार्केट में केमिस्ट शाप्स संचालक पर्ची पर लिखी दवा दे देते हैं, जबकि मरीजों या उनके तीमादारों को भी पता नहीं कि दवा की कीमत कितनी होगी?
- युवराज वालिया, दुकानदार 


निजी अस्पताल के चिकित्सक जेनरिक दवाइयों की प्रिस्क्रिप्शन लिखेंगे। इसके लिए निर्देश तो हैं, लेकिन जिला स्तर पर व्यवस्थाएं ही नहीं हैं। जेनरिक दवाओं को यदि डाक्टर लिखता भी है तो इसे मरीज कहां से खरीदेगा? इसके लिए पहले जिला स्तर पर कुछ तो व्यवस्थाएं दी जानी चाहिए। 
-डॉ. डीएस जसपाल, पूर्व वाइस प्रेजीडेंट, आईएमए 


जेनरिक दवाओं को लेकर फिलहाल स्वास्थ्य विभाग के पास कोई निर्देश नहीं हैं। सिविल अस्पतालों से तो निशुल्क दवाइयां दी जा रही हैं। यदि ओपन मार्केट में जेनरिक दवाओं को लेकर कोई निर्देश आते हैं तो काम होगा। 
विज्ञापन

-डॉ. विनोद गुप्ता, सीएमओ, अंबाला
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें