कारोबारी बोले- कभी 800 कारीगरों का था सहारा, अब गिनती के कारखाने बचे
संंवाद न्यूज एजेंसी
अंबाला। छावनी की मोची मंडी और रंगिया मंडी कभी चमड़े के जूतों के कारोबार का बड़ा केंद्र हुआ करता था। करीब 70 घरों और छोटे कारखानों में लगभग 800 कारीगर पारंपरिक तरीके से चमड़े के जूते बनाते थे। चौथी पीढ़ी तक यह पुश्तैनी काम चलता रहा और अंबाला के जूतों की सप्लाई जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब सहित कई राज्यों में होती थी। चमड़ा और अन्य सामग्री महंगी होने, मुनाफा कम होने और आगरा से आने वाले सस्ते जूतों के कारण अधिकांश कारखाने बंद हो गए हैं। वर्तमान में महज 11 घरों या छोटे कारखानों में ही चमड़े के जूते बनाए जा रहे हैं।
नई पीढ़ी नहीं अपना रही पुश्तैनी काम
कारीगरों का कहना है कि नई पीढ़ी इस मेहनत भरे और कम मुनाफे वाले काम को सीखने के बजाय सेल्समैन या अन्य रोजगार की ओर जा रही है। यदि समय रहते इस उद्योग को समर्थन नहीं मिला, तो अंबाला का यह पारंपरिक हुनर इतिहास बनकर रह जाएगा।
मोची मंडी में कभी 50 कारखाने थे
मोची मंडी निवासी सुनील बताते हैं कि जूते बनाने का काम उनके परिवार में परदादा से चला आ रहा है। पहले दादा, फिर पिता रमेश और अब वह खुद जूते बना रहे हैं। पहले मोची मंडी में करीब 50 कारखाने थे और 500 कारीगर घरों में जूते बनाते थे। उस समय अंबाला के जूतों की मांग जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और पंजाब में थी। एक दौर में अंबाला के जूतों ने आगरा के जूतों को भी पीछे छोड़ दिया था, लेकिन अब हिमाचल में सिर्फ वही अकेले जूते सप्लाई कर रहे हैं।
12 कारीगरों से सिमटकर 2 पर आया काम
रंगिया मंडी निवासी अविनाश बताते हैं कि वह 15 साल से इस पेशे में हैं। उनसे पहले उनके दादा शंभू दयाल और पिता शीतल यह काम करते थे। पहले उनके पास 12 कारीगर थे, जो एक दिन में 100 जोड़ी जूते बनाते थे, लेकिन अब सिर्फ दो कारीगर बचे हैं और एक सप्ताह में करीब 80 जोड़ी जूते ही बन पाते हैं। उनके जूतों की मांग बिलासपुर, नारायणगढ़, अंबाला सिटी, शहजादपुर, चंडीगढ़ और पटियाला में है।
30 कारखानों से घटकर रह गए सिर्फ पांच
रंगिया मंडी निवासी शिव प्रकाश बताते हैं कि वह तीसरी पीढ़ी के कारीगर हैं और पिछले 30 साल से जूते बना रहे हैं। पहले उनके पास चार कारीगर थे और रंगिया मंडी में 30 छोटे-बड़े कारखाने थे, लेकिन अब महज पांच कारखाने ही बचे हैं।
जूते छोड़ ई-रिक्शा और गाड़ी चलाने को मजबूर
रंगिया मंडी निवासी राजिंद्र बताते हैं कि उन्होंने और उनके भाई सुभाष ने 25 साल तक जूते बनाए, लेकिन सामग्री महंगी होने और कारीगर न मिलने के कारण सात साल पहले काम बंद करना पड़ा। अब वह ई-रिक्शा चला रहे हैं, जबकि उनका भाई गाड़ी चलाकर परिवार का पालन कर रहा है।
अविनाश
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