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Ambala News: मोबाइल के शोर में खो गई पतंगबाजी, सिमटकर रह गया बसंत पंचमी का त्योहार

Thu, 08 Jan 2026 01:40 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
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संदीप आहूजा। स्वयं
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अंबाला। वसंत पंचमी का त्योहार आते ही फिजाओं में पतंगों का रंग तो नजर आता है, लेकिन वो पुराना जोश अब कहीं सिमट गया है। अंबाला के रहने वाले संदीप आहूजा जब अपने बचपन की यादों के बारे में बताते हैं, तो उनकी आंखों के सामने आसमान में तैरते वह रंगीन कागज और सूतने वाला मांझा सजीव हो उठता है। उन्होंने कहा कि उस दौर की याद दिलाती हैं जब खुशियां मोबाइल डेटा से नहीं, बल्कि एक कटी हुई पतंग को लूटने के रोमांच से मिलती थीं।
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छोटे भाई के साथ जमती थी आसमानी जुगलबंदी

संदीप आहूजा बताते हैं कि उनके बचपन का सबसे खूबसूरत हिस्सा उनके छोटे भाई मनीष के साथ बीतता था। दोनों भाइयों को पतंगबाजी का जुनून इस कदर था कि वह मिलकर ढेर सारी पतंगें खरीदते थे। स्कूल की छुट्टी का दिन इनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता था। जब वे दूसरों की पतंग काटते, तो पूरे मोहल्ले में शोर मचाकर खुशी मनाते थे, लेकिन जैसे ही अपनी पतंग कटती, मन में एक गहरा अफसोस घर कर जाता था।





लुधियाना का वह कातिल मांझा और पिता का प्यार



उस दौर में मांझा भी खास हुआ करता था। संदीप के पिता उस समय हरियाणा राज्य परिवहन, अंबाला में कार्यरत थे। वह बताते हैं कि पिता बच्चों के शौक का पूरा ख्याल रखते थे और विशेष रूप से लुधियाना से मांझा मंगवाया करते थे। लुधियाना का मांझा उस समय अपनी मजबूती और धार के लिए मशहूर था। उसकी डोर इतनी तीखी होती थी कि पलक झपकते ही विरोधियों की पतंगें आसमान से जमीन पर आ जाती थीं।
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पतंगबाजों की सबसे बड़ी रुकावट टीवी एंटीना

आज की पीढ़ी ने शायद ही वह नजारा देखा हो, लेकिन संदीप के दौर में हर घर की छत पर टीवी का एंटीना लगा होता था। पतंग उड़ाते समय सबसे बड़ी चुनौती इन एंटीनाओं से बचना होता था। अक्सर पतंग की डोर या पतंग खुद एंटीना में उलझ जाती थी। उसे निकालने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी और इस खींचतान में कई बार बेशकीमती पतंग फट भी जाया करती थी।





बदल गया दौर अब मोबाइल में कैद बचपन



आज के बदलते समय को देखकर वह कहते हैं कि अब न तो गलियों में वो भागते बच्चे दिखते हैं और न ही आसमान में वह पेंच लड़ाने की कला। बच्चों में अब पतंगबाजी का वो पुराना क्रेज खत्म होता जा रहा है। आज का बचपन मैदानों और छतों के बजाय मोबाइल की स्क्रीन में सिमट कर रह गया है। खेलों की जगह अब सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स ने ले ली है।
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