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ऐतिहासिक धरोहर: अंग्रेजों की तकनीक का बेजोड़ नमूना जिसे भूकंप भी नहीं हिला सका अब विलुप्ति की कगार पर

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हंडेसरा सहित वाटर वर्क्स व लगी चिमनी - फोटो : Ambala
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उमेश भार्गव
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अंबाला। ट्विन सिटी के लाखों लोगों के कंठ को तृप्त करने वाला अंग्रेजों द्वारा स्थापित विख्यात हंडेसरा वाटर वर्क्स अब विलुप्त होने की कगार पर है। भूकंप के झटकों से भी नहीं हिल पाने और तत्कालीन तकनीक की शानदार पर्यायी यह धरोहर आज सरकार की उदासीनता का शिकार हो गई है।
ऐतिहासिक धरोहर इस वाटर वर्क्स की शुरुआत 1820 में हुई थी। इसे छोटी ईंटों और चूने से बनाया गया था। करीब 85 साल तक पूरे अंबाला कैंटोनमेंट और शहर में यहीं से पानी सप्लाई होता था। 1905 में हिमाचल के कांगड़ा में तीव्र गति का भूकंप आया। रिएक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 8.0 आंकी गई। इस भूकंप ने बहुत तबाही मचाई थी। इसका असर अंबाला स्थित हंडेसरा वाटर वर्क्स पर भी पड़ा। हालांकि यह स्मारक नहीं हिली लेकिन पानी का लेवल कई फीट नीचे चला गया। इसी कारण हंडेसरा वाटर वर्क्स बंद होने की कगार पर पहुंच गया।
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1907 में पानी को ऊपर लाने के लिए हंडसेरा और बोड़ाखेड़ा में पंप लगाए गए। कोयले से चलने वाले इंजन के कारण पैदा होने वाले धुएं को निकालने के लिए इस वाटर वर्क्स में चिमनी लगाई गई थी। 1908 से पहले इस वाटर वर्क्स को सिविल प्रशासन चलता था, लेकिन 1908 में इसे चलाने का जिम्मा अंबाला कैंटोनमेंट को फ्री में दे दिया गया था। करीब 25 साल तक यहां कोयले इंजन से पंप चले। 1932 में पहला डीजल इंजन लगाया गया। 1935 तक इसी वाटर वर्क्स ने अंबाला वासियों की प्यास बुझाई। इसके बाद वर्ष 1937 में अंबाला छावनी के बब्याल गांव में पहला बोरवेल लगाया गया। 60 प्रतिशत पानी की सप्लाई डक्ट वाटर सिस्टम और 40 प्रतिशत सप्लाई बोरवेल से होने लगी। हंडेसरा और बोड़ाखेड़ा में लगाए गए उस समय लगाए गए कोयला इंजनों की कीमत छह लाख 42 हजार 700 रुपये थी। बोड़ाखेड़ा से शहर और हंडेसरा से छावनी में पानी की सप्लाई होती थी। 1937 से अब तक अंबाला छावनी में 25 बोरवेल खुद चुके हैं।
अंबाला छावनी और शहर से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थापित है वाटर वर्क्स
अंबाला शहर और छावनी से करीब 8 किलोमीटर दूर पंजाब के मोहाली जिले में स्थित हंडेसरा वाटर वर्क्स अंबाला की डिफेंस कॉलोनी के साथ ही सटा है। इतिहास को खुद में समेटे हुए यह ऐतिहासिक विरासत आज सिमटने को है।
डक्ट वाटर सप्लाई सिस्टम से होती थी जलापूर्ति
यहां खेरा डक्ट वाटर सप्लाई सिस्टम से पानी सप्लाई होता था। इस सिस्टम में पानी का लेवल ऊंचा होता था। ट्विनसिटी में इससे जलापूर्ति के लिए हंडेसरा से करीब 6 किलोमीटर दूर टांगरी नदी के किनारों में कुएं खोदे गए थे। इन कुओं में पानी संरक्षित किया जाता था। संरक्षित पानी को यहां से आगे पहुंचाने के लिए अंग्रेजों ने भूमिगत नालियां बनवाई थीं। यह भूमिगत नालियां और कुएं छोटी ईंटों और चूने की बनाई गई थीं।
किताबों के पन्नों में भी नहीं है वर्णन
हंडेसरा के इस वाटर वर्क्स का विवरण किताबों के पन्नों में भी नहीं है। युवा पीढ़ी तो दूर की बात ज्यादातर बड़े-बुजुर्गों को भी हंडेसरा वाटर वर्क्स की अधिक जानकारी नहीं है। अंबाला और अंग्रेजों के शासनकाल का जीता-जाता गवाह और तत्कालीन समय की तकनीक का बेजोड़ नमूना आज भी अपने आप में किसी उपलब्धि से कम नहीं है। इसे बचाने के लिए अभी तक न तो पुरातत्व विभाग ने कोई कदम उठाया है न ही सरकार और जिला प्रशासन ने। अलबत्ता अंबाला जिले की यह एतिहासिक धरोहर अब पूरी तरह से विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी है।
ऐसे पहुंचा जा सकता है यहां तक
अंबाला छावनी के स्टाफ रोड से होते हुए और शहर से बलदेव नगर से होते हुए नारायणगढ़ मोड़ पहुंचकर मंडौर से पंजोखरा होते हुए हंडेसरा पहुंचा जा सकता है। इस ऐतिहासिक धरोहर को संजोए रखने के लिए इसके संरक्षण की जरूरत है।
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हमने इस ऐतिहासिक स्मारक को सुरक्षित करने के लिए इसका पिछला सारा रिकॉर्ड विभाग के भेजा है। इसे ऐतिहासिक स्मारक को बचाने के लिए हम पिछले पांच साल से प्रयासरत हैं। इस धरोहर को संजोए रखने की जरूरत इसलिए भी है कि यह उस वक्त जब तकनीक बहुत कम थी की बेजोड़ तकनीकी का नमूना था। भूकंप के तेज झटके भी इस स्मारक को गिरा नहीं पाए थे।
- कर्नल आरडी सिंह, सह संयोजक इंडियन नेशनल ट्रस्ट फोर आर्ट एंड क्लचरल हेरिटेज (इंटेक), अंबाला।
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