अंबाला। पद्म पुराण में श्री भीष्म पंचक व्रत की महिमा का वर्णन किया है। छावनी के हिल रोड स्थित श्री सनातन धर्म मंदिर के पंडित प्रवेश उनियाल बताते हैं कि भीष्म पंचक व्रत में चार द्वार वाला एक मंडप बनाया जाता है।
मंडप को गाय के गोबर से लीप कर मध्य में एक वेदी का निर्माण किया जाता है। इस वेदी पर तिल रख कर कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की जाती है। इस व्रत में कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं।
प्रतिदिन ऊं नमो वासुदेवाय मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए, प्रतिदिन संध्या के समय संध्या वंदना कर उपरोक्त मंत्र का 108 बार जाप कर भूमि पर शयन करना चाहिए। एकादशी से भगवान विष्णु का पूजन कर उपवास रखें, द्वादशी के दिन व्रतधारी मनुष्य भूमि पर बैठकर मंत्रोचारण के साथ गोमूत्र का सेवन करें। त्रयोदशी को केवल दूध ग्रहण करें। चतुर्दशी को दही का सेवन करें। इस प्रकार चार दिनों तक व्रत करें, जिससे शरीर की शुद्धि होती है।
पांचवें दिन स्नान कर भगवान केशव की पूजा करें तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दें। शाकाहारी भोजन करें तथा हर पल श्री हरि का पूजन करें। उसके बाद पंच गव्य खाकर अन्न ग्रहण करें। उन्होंने बताया कि विधिपूर्वक इस व्रत को पूरा करने से मनुष्य को शास्त्रों में लिखे फलों की प्राप्ति होती है। इस व्रत को करने से पुत्र की प्राप्ति होती है तथा महा पातकों का नाश होता है तथा मनुष्य परमपद को प्राप्त करता है, ऐसा पद्म पुराण में कहा गया है। इस व्रत में गंगा पुत्र भीष्म की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण का विधान है।