अंबाला। अंबाला छावनी का कैलाश मंदिर हाथी खाना उतर भारत के प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है। आजादी से पहले शेरशाह सूरी मार्ग (अब अमृतसर-अंबाला-नई दिल्ली हाइर्व) के पास घने जंगल में ब्रिटिश शासक यहां पर अपने हाथी बांधा करते थे। धीरे-धीरे यहां पर साधु संतों का डेरा लगने लगा व मंदिर बन गया। इसकी स्थापना सन 1844 से पूर्व हुई थी। यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। यहां विराजमान 40 फीट ऊंची अर्ध नारीश्वर की मूर्ति मुख्य आकर्षण का केंद्र है।
अंबाला ही नहीं विभिन्न राज्यों से भी लोग यहां दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां कोई भी भक्त पूरे सावन माह में नंगे पांव भोले बाबा के दर्शनों के लिए आता है तो उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। महाशिवरात्रि के दिन तो आधी रात से ही यहां दर्शनों के लिए भक्तों की भीड़ जुट जाती है।
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कांवड़िए गंगाजल से करते हैं जलाभिषेक
श्रावण माह में कांवड़िए काफी संख्या में हरिद्वार से गंगाजल लाकर यहां पर जलाभिषेक करते हैं। इस मंदिर का मुख्यद्वार आकर्षक ढंग से सजाया गया है। बीच में भगवान शिव की प्रतिमा के साथ ही दोनों तरफ हाथी की प्रतिमाएं बनाई गईं हैं। यही नहीं मंदिर परिसर में स्थापित नंदी व 40 फीट की भगवान अर्धनारीश्वर की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। इस मंदिर परिसर में सभी देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां पर अंबाला ही नहीं पूरे हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित दूर दराज से श्रद्धालु, संतों व साधुओं का आना लगा रहता है।
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जय राम दास महाराज लायलपुर वाले थे मंदिर के संस्थापक
हाथी खाना कैलाश मंदिर में अंग्रेजों के काल में फौज के हांथी बाधे जाते थे। उस समय यहां साधु संतों का डेरा होता था, जिस कारण मंदिर के नाम के साथ ‘हाथीखाना’ जुड़ा है। मंदिर के संस्थापक श्री श्री 1008 महंत श्री जय राम दास जी महाराज लायलपुर वाले थे। आगे उनके गद्दीनशीन शिष्य ही मंदिर की देखरेख कर रहे हैं। वर्तमान में मनमोहन दास महाराज गद्दीनशीन हैं।
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फोटो नंबर
प्राचीन कैलाश मंदिर हाथी खाना में जो भी श्रद्धालु सच्ची आस्था और निष्ठा के साथ भोले बाबा की पूजा-अर्चना करता है, तो भगवान शिव उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। महाशिवरात्रि पर भी कांवड़िए यहां जलाभिषेक करेंगे। बेल पत्र, भांग, पुष्प, घी, दही, शहद से विधि विधान से शिव की पूजा होगी। उस दिन समाजसेवी संस्थाएं भी स्टॉल लगाकर प्रसाद वितरित करेगीं।
- मनमोहन दास, महाराज, गद्दीनशीन