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Ambala News: आग के अंगारों पर नंगे पांव चलकर भक्त देंगे आस्था की परीक्षा

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इंद्राणी - फोटो : प्रतीकात्मक।
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- 14 अगस्त से मनाया जाएगा तीन दिवसीय करूमरियम्मन का 62वां शीतला माता सालाना मेला
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- महोत्सव में हरियाणा, पंजाब और चेन्नई से सैंकडों की संख्या में जुटेंगे श्रद्धालु
संवाद न्यूज एजेंसी
अंबाला। छावनी के बंधु नगर में करूमरियम्मन का 62वां शीतला माता सालाना मेला आयोजित किया जाएगा। इसमें हरियाणा, पंजाब और चेन्नई से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु जुटेंगे। छावनी के बंधु नगर स्थित शीतला माता मंदिर में 14 अगस्त से कलश पूजा और कलश परिक्रमा के साथ इस तीन दिवसीय महोत्सव का भव्य शुभारंभ होगा।
14 अगस्त को कलश पूजा और परिक्रमा के साथ उत्सव की शुरुआत होगी। इसके अगले दिन 15 अगस्त को मंदिर परिसर से माता की पालकी यात्रा निकाली जाएगी। महोत्सव के तीसरे और अंतिम दिन 16 अगस्त को छावनी के 12 क्रास रोड स्थित आंबेडकर पार्क से एक शोभायात्रा निकलेगी।
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इस दौरान भक्त अपनी गाल और जीभ में त्रिशूल आरपार करेंगे तथा पीठ को लोहे के हुक से भेदकर भारी वाहन खींचेंगे। यह शोभायात्रा विभिन्न बाजारों से होते हुए गुजरेगी। इसी दिन रात के समय शीतला माता मंदिर के सामने सैंकड़ों भक्तजन आग के अंगारों पर नंगे पांव चलकर आस्था की अग्नि परीक्षा देंगे।

तीन ईंटों से शुरू हुई थी यात्रा
इस ऐतिहासिक महोत्सव के बारे में 65 वर्षीय इंद्राणी ने बताया कि वर्ष 1964 में बंधु नगर में मात्र तीन ईंटों के सामने कलश रखकर माता शीतला की पूजा की शुरुआत की गई थी। समय के साथ आस्था बढ़ती गई और साल 1988 में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाकर माता शीतला की छोटी मूर्ति स्थापित की गई। 2018 में माता की बड़ी मूर्ति स्थापित की गई और 2024 में माता का भव्य मंदिर का निर्माण कर गुंबद भी बनाया गया।
उन्होंने बताया कि उस दौरान महोत्सव शुरू होने से पहले मंदिर पर झंडा फहराया जाता था। इसके बाद कुष्ठ आश्रम के पास फूलों और नीम के पत्तों से तीन कलश सजाए जाते थे। इन कलशों को 10 से 11 वर्ष की तीन कन्याओं के सिर पर रखकर ढोल-नगाड़ों के साथ बंधु नगर लाया जाता था। रास्ते में इन कलशों को तीन युवकों के सिर पर भी बदला जाता था। बंधु नगर में परिक्रमा करवाने के बाद इन कलशों को माता की मूर्ति के सामने रखकर विशेष पूजा-अर्चना की जाती थी और पांचवें दिन जनसुई हेड की नहर में इनका विसर्जन किया जाता था। इन दिनों में श्रद्धालु तीन, सात और 21 दिनों तक कठिन व्रत भी रखते हैं।
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तीन पीढ़ियों से जुड़ी है आस्था
गणेश ने बताया कि जैसे-जैसे समय बीता, माता के दरबार में भक्तों की संख्या में इजाफा होने लगा। वर्ष 1999 से इस मेले में एक नया अध्याय जुड़ा। जिन भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हुईं या जिन्होंने मन्नत मांगी थी, उन्होंने गाल व जीभ में त्रिशूल आरपार कर और पीठ में हुक चुभोकर वाहन खींचते हुए बाजारों से शोभायात्रा निकालना शुरू किया। तभी से बाजारों में इस भव्य शोभायात्रा और मंदिर के सामने आग के अंगारों पर नंगे पांव चलकर अग्नि परीक्षा देने की परंपरा की शुरुआत हुई। बाबू पुजारी ने बताया कि जब से शीतला माता की पूजा की शुरुआत हुई है, तब से लेकर आज तक उनके क्षेत्र की तीन पीढ़ियां माता की पूजा करती आ रही हैं।

इंद्राणी- फोटो : प्रतीकात्मक।

इंद्राणी- फोटो : प्रतीकात्मक।

इंद्राणी- फोटो : प्रतीकात्मक।

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