अंबाला। आजादी के लिए अंबाला में 1857 में हुए विद्रोह से पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल बज गया था। कभी अंबाला के अधीन आने वाले पड़ोसी जिले यमुनानगर की बुड़िया व कलसिया रियासतों के राजाओं ने कभी अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी स्वीकार नहीं की थी। कुरुक्षेत्र की लाड़वा रियासत के राजा ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने से साफ मना कर दिया था। जब तक तीनों रियासतों के राजा जिंदा रहे तब तक इन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम करके रखा। इतिहास के पन्नों में दफन ये राज एक रिसर्च में उजागर हो चुके हैं।
विरोध की वजह से नहीं कर पाए अंग्रेज कब्जा
बुड़िया के राजा शेर सिंह व छछरौली की कलसिया रियासत के राजा जोध सिंह तथा लाड़वा के राजा अजीत सिंह ने 1800 से पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी। कई बार अंग्रेजी हुकूमत ने इन राजाओं को उनकी गुलामी स्वीकार करने का पैगाम भेजा। मगर हर बार इन राजाओं ने उनके आदेश को मानने से इंकार कर दिया था। बेशक इतिहास में इन राजाओं के विरोध को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की नजर से नहीं देखा जाता। मगर यह साफ है कि इन राजाओं की बगावत के बाद ही विद्रोह की नींव पड़नी शुरू हो गई थी। राजा जोध सिंह व राजा अजीत सिंह ने मरते दम तक अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की।
सहारनपुर की लड़ाई में शेर सिंह ने दिखाए जौहर
बुड़िया रियासत के राजा शेर सिंह के विरोध की वजह से अंग्रेजी हुकूमत बेहद खफा थी। इसी वजह से राजा शेर सिंह की रियासत पर कब्जा जमाने की अंग्रेजों ने कई बार कोशिश की। रियासत पर कब्जे को लेकर 1804 में राजा शेर सिंह का सहारनपुर में अंग्रेजों सामना हुआ। यहां हुए युद्ध में राजा शेर सिंह ने अपनी बहादुरी के जौहर दिखाए। युद्ध् में कई गोलियां लगने के बावजूद राजा शेर सिंह ने सरेंडर नहीं किया। अंतिम सांस तक युद्ध में लड़ते हुए राजा शेर सिंह शहीद हो गए थे । हालांकि उन्हें कभी शहीद का दर्जा नहीं मिला। अंग्रेजी सेना की अगुवाई कर रहे कर्नल बर्न ने भी राजा शेर सिंह की शहादत को सलाम करते हुए उनकी बहादुरी की जमकर प्रशंसा की थी।
नासीरी पलटन ने किया था विद्रोह
10 मई 1857 को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अंबाला में विद्रोह का बिगुल बजा था। फायरिंग रेंज में राइफल ट्रेनिंग के लिए आए नासीरी पलटन के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी। इसके कुछ घंटे बाद ही मेरठ समेत कई जगह विद्रोह की आग भड़क उठी थी। हालांकि अंग्रेजों को सैनिक विद्रोह की पहले ही भनक लग गई थी। इसी वजह अंग्रेजी हुकूमत ने पटियाला, नाभा व जींद रियासत के राजाओं की मदद से इस विद्रोह को दबाने की कोशिश की। इन राजाओं की मदद से ही अंग्रेजी हुकूमत के बड़े अधिकारियों के परिवारों को सुरक्षित जगह ले जाया गया था। अंबाला कमिश्नरी के तत्कालीन कमिश्नर मेजर बार्न ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है।
यह बिल्कुल सच है कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह 1857 से पहले ही शुरू हो चुका था। मगर उस विद्रोह को कभी विद्रोह नहीं माना गया। बुडिया, कलसिया व लाड़वा रियासत के राजाओं ने मरते दम तक कभी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की। अंग्रेजों का विरोध करते ये राजा शहीद हो गए। मेरी रिसर्च में यह सच सामने आया है। इसके ऐतिहासिक सबूत भी हैं। बाकायदा इसको लेकर मेरे दो रिसर्च पेपर भी प्रकाशित हो चुके हैं। पड़ोसी रियासत के राजाओं की मदद से ही अंग्रेज 1857 की क्रांति को दबाने में कामयाब रहे।
-डॉक्टर वीरेंद्र ढिल्लों, इतिहासकार
civic- फोटो : Ambala