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Ambala News: हमेशा बीमार होने का भ्रम, मामूली रोग को मान लेते हैं गंभीर

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हाइपोकॉन्ड्राइसिस फोबिया-
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बदलती जीवनशैली, इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध चिकित्सीय जानकारी और स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता ने लोगों में हमेशा बीमार रहने का भ्रम पैदा कर दिया है। मामूली रोग को गंभीर मान लेना और मन में बनी स्वास्थ्य संबंधी आशंका जब हद से बढ़ जाती है, तो व्यक्ति हर छोटी परेशानी को बड़ी बीमारी का संकेत समझने लगता है। इस स्थिति को हाइपोकॉन्ड्राइसिस फोबिया कहा जाता है।
कई लोग हल्के सिरदर्द, थकान या पेट दर्द को भी गंभीर बीमारी का संकेत मानने लगे हैं। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक ने बताया कि हर दिन लगभग 150 मरीज ओपीडी में आते हैं, जिनमें स्वास्थ्य संबंधी अत्यधिक डर और खुद को बीमार मान लेने वाले मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इनकी संख्या 15 से 20 तक रहती है। यह समस्या अधिकतर युवा वर्ग, कामकाजी लोग, महिलाएं और तनावग्रस्त परिवारों में दिखाई दे रही है।
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बार-बार ऑनलाइन लक्षण पढ़ना, किसी परिचित की बीमारी का प्रभाव, पहले हुए इस विकार से पीड़ित लोग डॉक्टरों के पास बार-बार दौड़ लगाते हैं, कई तरह की जांचें कराते रहते हैं और दिमाग में डर इतना गहरा बैठ जाता है कि उपचार की रिपोर्ट ठीक आने पर भी उन्हें संतोष नहीं मिलता। लगातार तनाव, थकान, भ्रम और चिंता उनका रोजमर्रा का हिस्सा बन जाते हैं। यह मानसिक स्थिति व्यक्ति को परिवार, काम और सामाजिक जीवन से भी दूर करने लगती है।


लक्षण
हल्के लक्षण को भी गंभीर बीमारी मान लेना, बार-बार डॉक्टर बदलना और जांच करवाना, ऑनलाइन बीमारी खोजने में अत्यधिक समय बिताना, कोई रिपोर्ट सामान्य आने पर भी संतोष न होना, लगातार चिंता, बेचैनी और नकारात्मक सोच, अपने स्वास्थ्य को लेकर अतिसंवेदनशीलता।
-बचाव और उपाय-
इंटरनेट पर अनावश्यक स्वास्थ्य खोज से दूरी बनाएं, वास्तविक लक्षणों और भ्रम में फर्क समझें, नियमित लेकिन सीमित स्वास्थ्य जांच करवाएं, तनाव कम करने वाली तकनीकें अपनाएं, परिवार से खुलकर बात करें और डर दबाकर न रखें, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लें।
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वर्जन-
हाइपोकॉन्ड्राइसिस फोबिया में व्यक्ति सामान्य शारीरिक संकेतों को गंभीर बीमारी समझ लेता है। दिमाग लगातार खतरे की स्थिति में रहकर नकारात्मक विचारों को बढ़ावा देता है। समय पर इलाज न मिले तो यह चिंता, अवसाद और सामाजिक दूरी तक ले जा सकता है। काउंसलिंग, व्यवहार चिकित्सा और परिवार के सहयोग से मरीज धीरे-धीरे इस भय से बाहर आ सकता है।
- डॉ. सौभाग्य कौशिक, मनोरोग विशेषज्ञ, जिला नागरिक अस्पताल
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