अंबाला। हर किसान का सपना होता है कि वह परंपरागत तरीका छोड़कर नए तरीके से खेती करे। अमूमन पैदावार बढ़ाने के लिए किसान कृषि क्षेत्र में नई-नई तकनीक का प्रयोग करते भी हैं। ऐसे ही नकटपुर गांव के रहने वाले युवा किसान हैं निर्मल सिंह। शिक्षा की बात करें तो इन्हें ट्रिपल एमए, एमएड, एमफिल के साथ पीएचडी की डिग्री ले रखी है। बतौर शिक्षक की नौकरी ज्वाइन करने का ऑफर भी मिला, लेकिन उन्होंने नौकरी ज्वाइन न कर आधुनिक तरीके से खेती की ओर अपना रुख किया। आज इसी का परिणाम है कि वह 100 एकड़ भूमि में बासमती चावल उगा रहे हैं। जो दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
बातचीत में निर्मल सिंह ने बताया कि खेती के बढ़ते खर्च को कम करने के लिए अब निर्मल सिंह को विदेशों से भी कॉल आती हैं। कई दूसरे किसान भी अब निर्मल सिंह के तरीकों को अपनाकर मालामाल हो रहे हैं। खेतों में दौड़ती 40 लाख की ऑडी उनकी कामयाबी की कहानी बयां करने के लिए काफी है। 2012 से लंदन की एक राइस कंपनी बासमती खरीदने सीधे उनके खेतों में पहुंच रही है।
छोटी उम्र में सिर से उठ गया था पिता का साया
छोटी उम्र में सिर से पिता का साया उठ जाने की वजह से निर्मल ने स्कूल शिक्षा के साथ घर की खेती को संभाल लिया था। खेती के साथ ही उसने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 1997 के बाद उन्होंने खेती को उन्नत तरीके से करने का निर्णय लिया। पहले इसके बारे में खूब जानकारी जुटाई। निर्मल सिंह कहते हैं कि घर की 40 एकड़ जमीन होने के बावजूद उसने 60 एकड़ जमीन ठेके पर लेकर खेती शुरू की। 1997 के बाद कभी खेतों में आग नहीं लगाई। इसका फायदा ये हुआ कि खेतों में रिकार्ड फसल की पैदावार होने लगी। खर्च कम करने व मुनाफा ज्यादा लेने के लिए सिंचाई के तरीके में भी सुधार किया बढ़ते मुनाफे के बाद एक बार तो निर्मल ने 100 एकड़ जमीन खेती के लिए ठेके पर ली थी।
सिंचाई के लिए खेत में बनाया जोहड़
जल स्तर नीचे जाने की वजह से इस युवा किसान ने सिंचाई की व्यवस्था में बेहतरीन सुधार किया। इसके लिए उसने खेतों में ही एक जोहड़ का निर्माण किया। इसमें बरसाती पानी जमा कर उसका इस्तेमाल खेती में होने लगा। जोहड़ तक पानी पहुंचाने के लिए पास से ही गुजर रही नरवाना ब्रांच नहर से भी पाइपलाइन डालकर पानी की व्यवस्था की। इसके बाद पानी की खपत को कम करने के लिए पूरी जमीन पर फव्वारा सिस्टम लगाकर उससे ही सिंचाई करनी शुरू की। निर्मल सिंह कहते हैं कि इस सिस्टम से न केवल पानी की बचत होने लगी बल्कि फसलों को भी पूरा पानी मिलने लगा।
पेस्टीसाइड व यूरिया की जगह देसी खाद का इस्तेमाल
भरपूर फसल के लिए निर्मल सिंह अपने खेतों में पेस्टीसाइड व यूरिया का इस्तेमाल बेहद करते हैं। खुद की केंचुआ खाद तैयार कर उसे ही खेतों में डालते हैं। इसके अलावा खाद के तौर पर गोबर का भी इस्तेमाल किया जाता है। निर्मल सिंह कहते एक फसल लेने के बाद वे खेत को दूसरी फसल के लिए तैयार करते हैं। मगर इसके लिए ट्रैक्टर का कभी इस्तेमाल नहीं करते। खेत में पानी छोड़कर उसमें बिजाई शुरू करते हैं।