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ओवरलोड स्कूली वाहन, जोखिम में लाडले

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बच्चों से ओवरलोड ऑटो, जोखिम में लाडले
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मुनीष कुमार
अंबाला सिटी। व्यस्त जीवनशैली के चलते कई अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने नहीं जा पाते तो वह बच्चों के लिए बस लगवा देते हैं जिसके लिए उन्हें ट्रांसपोर्ट की फीस देनी पड़ती है। वहीं, कुछ अभिभावक सस्ते ट्रांसपोर्ट के चक्कर में बच्चों के लिए ऑटो लगवा देते हैं, लेकिन अभिभावक यह जानने की कोशिश नहीं करते कि जिस ऑटो में उनका बच्चा स्कूल जाता है या स्कूल से आता है, क्या उसमें नियमों की पालना हो रही है। अकसर चालक ऑटो में बच्चों को ठूस-ठूसकर भर लेते हैं लेकिन इसमें लापरवाही केवल चालक की ही नहीं अभिभावकों की भी है। इसी लापरवाही के चलते कई बार हादसे भी हो चुके हैं। इसके बावजूद न तो अभिभावक इस पर कोई आवाज उठाते हैं और ट्रैफिक पुलिस भी दोपहिया वाहनों के चालान काटने में व्यस्त रहती है जबकि इन ऑटो चालकों को अनदेखा कर दिया जाता है। ऐसे में बच्चों की जान पर हर समय जोखिम बना रहता है।
गत वर्ष गुरुग्राम के एक स्कूल में छात्र की हत्या होने के बाद निजी स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर शिक्षा मंत्री ने कई आदेश जारी किए थे, वहीं सेफ्टी कमेटी का गठन भी किया था, लेकिन यह आदेश स्कूलों के अंदर व स्कूल बसों पर ही लागू हुए, लेकिन बच्चों को स्कूल से लाने व ले जाने वाले ऑटो चालकों पर किसी भी अधिकारी या प्रशासन ने कार्रवाई करना उचित नहीं समझा। इसी का फायदा ऑटो चालक उठा रहे हैं। जहां ऑटो में 5 लोगों के लिए बैठने की सीट होती है, वहां 10 से 12 बच्चे बिठाए जाते हैं और ऊपर से उनके बैग भी ऑटो के आगे वाले हिस्से में लटका रखे होते हैं। ऐसे में चालक को ऑटो चलाते वक्त पीछे मुड़कर देखने के लिए कोई विकल्प नहीं रहता। ऐसे में कोई वाहन पीछे से तेज गति से आ रहा हो और ऑटो को मुड़ना हो तो ऐसे में हादसा होने का डर रहता है।
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जहां सामान रखने की जगह वहां भी बैठा लेते हैं बच्चे
ऑटो में जहां पिछले हिस्से में सामान रखने की जगह होती है, चालक वहां भी 3 से 4 बच्चे बैठा लेते हैं। बच्चे अकसर ऑटो को पकड़कर बैठने के बजाय हाथ छोड़कर शरारत करते हुए जाते हैं, ऐसे में अगर कोई बच्चा गिरकर घायल हो जाता है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा।
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स्कूली वाहनों के लिए फीस ज्यादा
भारी-भरकम फीस वसूलने के बाद भी निजी स्कूल सस्ती वाहन सेवा उपलब्ध करवाने में फेल साबित हो रहे हैं। अकसर अभिभावकों को कहते देखा है कि स्कूल की ओर से उपलब्ध करवाई गई बसों की फीस के लिए एक हजार या इससे अधिक वसूलते हैं, लेकिन वहीं ऑटो चालक 500 से 600 रुपये लेते हैं। सस्ते ट्रांसपोर्ट के चक्कर में अभिभावक अपने बच्चों की जान जोखिम में डालने से परहेज नहीं करते।
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दी जा चुकी गाइडलाइन
फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइन दी जा चुकी हैं। इसमें चौकीदार से लेकर सीसीटीवी लगाए जाने की बात कही गई थी, लेकिन स्कूल संचालक भी अभिभावकों की ओर से बच्चों को ऑटो में स्कूल भेजने की बात से यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उन्होंने स्कूल की ओर से बसें उपलब्ध करवा रखी हैं। ऐसे में अगर कोई हादसा होता है तो इसमें स्कूल की कोई गलती नहीं, बल्कि अभिभावकों को समझना चाहिए कि वह बच्चे को मजह 400 से 500 रुपये के चक्कर में न पड़कर उन्हें अच्छी ट्रांसपोर्ट उपलब्ध करवाएं।
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सिर्फ फोन नंबर ही काफी नहीं
आमतौर पर देखा गया है कि अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए जिस ऑटो को लगाते हैं, उस ऑटो चालक का सिर्फ फोन नंबर ही लेते हैं, लेकिन अगर किसी दिन बच्चा स्कूल से घर पहुंचने में लेट हो जाए और ऑटो चालक भी फोन न उठाए तो अभिभावक का चिंतित होना भी लाेिेजमी है। वहीं अगर अभिभावक के पास उस ऑटो चालक का पता भी हो और हो सके तो उसकी एक आईडी भी हो तो इससे कोई भी ऑटो चालक बच्चों के साथ किसी भी तरह का गलत कार्य करने से परहेज करेगा।
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डीसी ने ली थी बैठक
डीसी शरणदीप कौर बराड़ ने 11 दिसंबर को निर्देश दिए थे कि अधिकारी सुनिश्चित करें कि जिले में वाहन चालक यातायात नियमों का पालन करें तथा धुंध में हेडलाइट जलाकर चले। उन्होंने कहा कि सभी स्कूल संचालक और स्कूल वाहन चालक यह सुनिश्चित करें कि वाहनों के लिए न्यायालय द्वारा निर्धारित मापदंड हर हाल में पूरे हों। उन्होंने कहा था कि जिले के चारों एसडीएम अपने क्षेत्र में स्कूल वाहनों में इन नियमों के पालन सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर जांच करें और कमी पाए जाने पर चालान के साथ-साथ ऐसे वाहन के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई भी करें।
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8 से 10 सवारियां न बैठ जाएं, तब तक ऑटो चलाते ही नहीं
ट्रैफिक पुलिस रोजाना दोपहिया वाहनों के चालान तो करती देखी जाती है, लेकिन ऑटो चालकों के चालान करने से शायद परहेज करती है, क्योंकि ऑटो चालक सिर्फ स्कूली बच्चों को ही नहीं, बल्कि आम सवारियों को भी ऑटो में उपलब्ध सीट से ज्यादा भरकर चलते हैं। ऐसे में हादसे का जिम्मेदार जहां ऑटो चालक है, वहीं ट्रैफिक पुलिस भी है। कुछ ऑटो चालक तो ऐसे हैं कि जब तक ऑटो में 8 से 10 सवारियां न बैठ जाएं तब तक ऑटो चलाते ही नहीं।
वर्जन
निजी व सरकारी स्कूलों में सेफ्टी कमेटी बनाई हुईं हैं। अभिभावकों को चाहिए कि वह अपने बच्चों को जिस ऑटो में भेज रहे हैं उसके चालक का फोन नंबर व पता भी लें। वहीं बच्चों को जिस ऑटो में भेजें, उसमें जितनी सीट हैं उतने ही बच्चे बैठे हों। अगर अभिभावक ऐसा नहीं करते हैं तो इसमें अभिभावकों की ही लापरवाही है।
-उमा शर्मा, डीईओ, अंबाला।
वर्जन
एसोसिएशन द्वारा निजी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा के लिए गाइडलाइन दी जा चुकी हैं। स्कूलों ने भी इन गाइडलाइन का पालन किया और स्कूलों की कंडम बसों को सड़कों पर नहीं उतारा। वहीं अब अगर अभिभावक अपने बच्चों को किसी भी ऑटो में स्कूल भेजते हैं तो उसकी जिम्मेदार अभिभावकों की ही है। इसमें स्कूल संचालकों का कोई रोल नहीं।
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-कुलभूषण शर्मा, प्रधान, फेडरेशन ऑफ प्राइवेट स्कूल वेलफेयर एसोसिएशन।
वर्जन
पुलिस ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों का हमेशा चालान करती है, फिर चाहे दोपहिया वाहन चालक हो या ऑटो चालक। कुछ जिम्मेदारी अभिभावकों की भी बनती है कि वह बच्चों को अच्छी ट्रांसपोर्ट सुविधा दें और ऑटो चालकों का फोन नंबर, पता व आईडी लेकर रखें और जो ऑटो लगाएं उसमें उपलब्ध सीट से ज्यादा सवारियां बैठाने से ऑटो चालक को मना करें। वहीं स्कूलों में भी समय-समय पर बच्चों को ट्रैफिक नियमों के बारे में जागरूक किया जा रहा है।
-सुल्तान सिंह, डीएसपी, अंबाला।
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