अंबाला कैंट/शहजादपुर/मुलाना। दुर्गंम चोटियों पर लड़े गए कारगिल युद्ध की यादें आज भी शहीदों के परिवार सदस्यों के जहन में ताजा हैं। जिले में वीर सपूतों ने इस युद्ध में अदम्य शौर्य का प्रदर्शन करते हुए युद्ध भूमि में वीरगति हासिल की थी। तब सरकारों ने शहीदों के सम्मान में बड़ी-बड़ी घोषणाएं तक की थी, मगर आज कारगिल दिवस से पहले अमर उजाला ने शहीदों के परिवारों से बात की तो उनका दर्द झलक गया। आलम यह है कि गांव कांसापुर के शहीद सिपाही मंजीत सिंह के नाम पर खोली गई प्राथमिक पाठशाला आज खंडहर हो चुकी है जबकि गांव पत्तरेहड़ी के शहीद सिग्नल मैन नरेश सैनी के परिवार को आज तक न तो कोई गैस एजेंसी और न ही पेट्रोल पंप अलॉट किया गया है। कई बार मांगे उठाई जा चुकी है। सरकारी आश्वासन तो मिले हैं, लेकिन धरातल पर यह घोषणाएं लागू नहीं हो सकी है। जिले में इस समय कारगिल युद्ध में शहीद हुए चार सैनिकों के परिवार हैं।
पांच साल पहले बंद हुआ स्कूल
कांसापुर के शहीद सिपाही मंजीत सिंह की माता सुरजीत कौर कहती हैं कि आज उनका बेटा होता तो क्या बात होती। उन्हें फर्क है कि उनके बेटे ने देश के लिए सर्वोच्च सेवा दी। मंजीत सिंह 7 जून 1999 में कारगिल में आपरेशन विजय में दुश्मनों को धराशाई करते हुए छाती पर गोली लगने से शहीद हुए थे। शहीद के भाई हरजीत सिंह ने बताया कि शहीद के गांव में बच्चों के शिक्षा ग्रहण करने के लिए शहीद के नाम से खोला गया सरकारी स्कूल अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। उन्होंने कहा कि या तो स्कूल को पुन: खोला जाए या फिर शहीद के नाम से कोई अन्य संस्था यहां खोली जाए। कम बच्चों का हवाला देते हुए करीब पांच वर्ष पूर्व सरकार ने इस स्कूल में ताला जड़ दिया। उन्होंने बताया कि अब गांव के बच्चों को दूसरे गांव धीन के सरकारी स्कूल में जाकर पड़ना पड़ रहा है। हरजीत सिंह ने बताया कि कई बार विधायक व सरकार से स्कूल खोलने के लिए गुहार लगाई है, मगर सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि हालांकि शहीद के नाम पर एक गैस एजेंसी फिलहाल सरकार द्वारा अलॉट की गई है जोकि इस समय चलाई जा रही है। उनके अपने दो बेटे हैं जिन्हें वह सेना में भर्ती कराने का पूरा प्रयत्न करेंगे।
न एजेंसी मिली न ही पंप, स्कूल का नाम भी कागजों में नहीं
कारगिल युद्ध में गांव पत्तरेहड़ी के शहीद हुए सिग्नलमैन नरेश कुमार सैनी का परिवार आज सरकारी रवैये से खुश नहीं है। नरेश कुमार की माता कमलेश देवी बताती हैं कि उनके तीन बेटों में सबसे छोटे नरेश कुमार थे जिन्हें बचपन से फौजी बनने का शौक था। वह वर्ष 1996 में सेना में भर्ती हुए थे और वर्ष 1999 में शहीद हो गए थे। परिवार को बेटे की शहादत पर फर्क है लेकिन अगर बात की जाए शहीदों के सम्मान की तो सरकार की तरफ से कोई खास मदद नहीं मिली है। पहले तो सरकार के नुमाइंदे उन्हें कभी गैस एजेंसी तो कभी पेट्रोल पंप देने तक कि बातें करते थे लेकिन आज तक कोई सुविधा नहीं मिल सकी है। कमलेश देवी का कहना था कि उनके शहीद बेटे के नाम से कोई शहीद स्मारक अब तक नहीं बना है और गांव में जो स्कूल है कहने को तो उसका नाम शहीद नरेश कुमार के नाम से है लेकिन कागजों में ऐसा कुछ नही है। उन्होंने बताया कि सरकार नहीं बल्कि सेना द्वारा हर वर्ष उन्हें कारगिल दिवस या अन्य समारोह में शरीक करने के लिए बुलाया जाता है। ऐसे समारोह में शामिल होकर उन्हें बेटे की शहादत पर गर्व महसूस होता है। वहीं शहीद नरेश कुमार के भाई अमराव सिंह का कहना था कि उनके परिवार से सभी बच्चे छोटे है लेकिन उनकी बेटी भी सेना में जाना चाहती है वह अपने चाचा की तरह देश सेवा को पूरी तरह से समर्पित है।
चाचा की तरह करूंगा देस सेवा : जसविंद्र
कारगिल युद्ध में गदौली के शहीद पवन कुमार सैनी के परिवार को उनकी शहादत पर गर्व है। शहीद के भतीजे जसविंद्र बताते हैं कि उनको सरकार की तरफ से काफी मदद मिली है। शहीद के नाम से पंप, सड़क का नाम व अन्य सुविधाएं दी गई है। जसविंद्र का कहना है कि वह भी अपने चाचा की तरह सेना में भर्ती होकर देश सेवा करना चाहता है।