पहले हर रविवार होते थे दंगल, आज सिमट रहे अखाड़े, जिले में नहीं दिखती महिला रेसलर
अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला कैंट।
दंगल और सुल्तान जैसी फिल्में तो आपको खूब याद होंगी, इन दोनों फिल्मों ने विश्वभर में पहलवानी में हरियाणा को एक अलग पहचान दिलाई। इसके साथ ही रेसलिंग में कॅरियर तलाश रहे पहलवानों को हौसला भी दिया, लेकिन अंबाला में रेसलिंग कल्चर पहले के मुकाबले कम हो रहा है। खासतौर पर महिला रेसलिंग का भविष्य अभी उदय ही नहीं हो पाया है। प्रदेश के खेलमंत्री अनिल विज के शहर में अखाड़ों से महिला रेसलरों की दूरी है या यूं भी कह सकते हैं कि कभी महिलाओं पहलवानों ने अखाड़ों का रुख ही नहीं किया। सिर्फ इतना ही नहीं अखाड़ों की संख्या भी सिमटती जा रही है, जबकि अंबाला में रेसलिंग कल्चर जो कभी चरम पर था आज कम होता जा रहा है।
यह है स्थिति
अंबाला में करीब दो दर्जन अखाड़े हैं, जिनमें पहलवान प्रेक्टिस करते हैं। इसके अलावा खेल विभाग के तहत वार हीरोज स्टेडियम में बने सेंटर में पहलवान अपने खेल को निखार रहे हैं। इससे करीब दो दशक पहले 50 से 60 अखाड़े थे, हर रविवार दंगल में हुआ करता था। लेकिन अब सच यह भी है कि पहलवानों के कदम रेसलिंग मैट और अखाड़ों में आने से कतराने लगे हैं खासतौर पर महिला पहलवानों का। दावा है कि कुछ लड़कियां खेल विभाग के सेंटर में अभ्यास करती हैं। दूसरी ओर अखाड़ों की बात करें, तो इनमें कभी महिला रेसलर तो उतरी ही नहीं। एक कारण यह भी है कि अखाड़ों में सुविधाओं का अभाव है। सबसे जरूरी डाइट को लेकर ही रेसलर बीच में ही खेल छोड़ जाते हैं।
रेसलिंग से जुड़े इवेंट्स न के बराबर
अंबाला में कभी रेसलिंग कल्चर इतना था कि हर रविवार को अंबाला में दंगल हुआ करते थे। लेकिन बीते करीब दो दशकों से यह धीरे-धीरे हाशिये पर चला गया। दूसरी ओर खेल विभाग भी साल में एक-दो आयोजन करता है, जबकि स्कूल स्तर पर भी साल में एक बार ही आयोजन होता है।
यह कहते हैं अखाड़े के कोच
महावीर अखाड़े में पहलवानों को कुश्ती सिखा रहे प्रशिक्षक जयराम पहलवान ने कहा कि कुश्ती के लिए सरकार प्रयास तो कर रही है, लेकिन स्पोर्ट्स कल्चर जब तक नहीं पनपता, तब तक कुछ नहीं होगा। अखाड़ों को और सुविधाएं दी जाएं जबकि खिलाड़ियों के लिए डाइट का भी प्रबंध किया जाए, तो बेहतर परिणाम सामने आएंगे। जहां तक लड़कियों का इस खेल में न आने का कारण है, उसके लिए तो अभिभावकों को आगे आना होगा।
खेल विभाग के सेंटर में कुछ लड़कियां प्रशिक्षण ले रही हैं। इसके अलावा कुश्ती जैसे खेल के लिए काफी कुछ किया जा रहा है, जबकि कुछ अखाड़ों को मैट भी दिए गए हैं।
- अरुणकांत, डीएसओ अंबाला