गुजरात की 8 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आ चुके हैं। सभी आठों सीटों पर भाजपा ने शानदार जीत दर्ज करते हुए कांग्रेस को चारों खाने चित कर दिया। कांग्रेस की हार इस वजह से और ज्यादा करारी है, क्योंकि उसने पाटीदार समाज का वोट साधने के लिए हार्दिक पटेल को चुनाव से ठीक पहले कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया था, लेकिन उपचुनाव के नतीजों से स्पष्ट है कि कांग्रेस न तो पाटीदार समाज का वोट साध पाई और न ही एक भी सीट जीत सकी। इस रिपोर्ट में जानते हैं कि गुजरात उपचुनाव में कांग्रेस की इस करारी हार के मायने क्या हैं और इस हार से 2022 के विधानसभा चुनावों पर क्या असर पड़ेगा?
मुद्दे भुनाने में विफल
गुजरात में कांग्रेस की नाकामयाबी की बात करें तो लगता है कि पार्टी स्थानीय मुद्दे पर फोकस ही नहीं कर रही है। यही वजह है कि वर्तमान उपचुनाव के साथ-साथ पिछले विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। दरअसल, भाजपा हर बार विकास का मुद्दा उठाती है, जबकि कांग्रेस ने बेरोजगारी, सुस्त अर्थव्यवस्था और भाजपा के अधूरे वादों को मुद्दा बनाया, लेकिन इन्हें सही तरीके से भुना नहीं सकी। गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस की यह हालत तब है, जब गुजरात में अब नरेंद्र मोदी नहीं हैं, जिससे वहां भाजपा संगठन थोड़ा कमजोर हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने काफी मेहनत की थी, लेकिन अंतिम दौर में मणिशंकर अय्यर के बयान ने पूरा खेल बदल दिया और नतीजों का रुख बीजेपी की ओर कर दिया।
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पाटीदार समाज को साथ लाने में असफल
गुजरात के चुनावों में पाटीदार समाज के वोटों का अहम रोल होता है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों इस समाज का रुख अपनी ओर मोड़ने में लगी रहती हैं, लेकिन कांग्रेस की रणनीति इस मामले में भी लगातार विफल हो रही है। उपचुनाव में पाटीदार समाज का साथ पाने के लिए कांग्रेस ने हार्दिक पटेल को आनन-फानन में कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया, लेकिन उसका दांव सही नहीं बैठा। ऐसे में कांग्रेस पार्टी को 8 सीटों पर हुए उपचुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ गया।
राज्य में बड़ा चेहरा न होना
गुजरात में कांग्रेस की नाकामी की बड़ी वजह पार्टी के पास कोई बड़ा चेहरा न होना भी है। दरअसल, गुजरात कांग्रेस में अहमद पटेल बड़ा चेहरा थे, लेकिन पार्टी ने हार्दिक पटेल का कद बढ़ाते हुए उन्हें लगभग साइडलाइन कर दिया। इसका खमियाजा पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ गया। इसके अलावा कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के माध्यम से अल्पेश ठाकोर की कमी पूरा करने की कोशिश की, लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं मिला। दरअसल, हार्दिक पटेल पाटीदार समाज के नेता हैं। ऐसे में वह एक समाज का रुख तो मोड़ सकते हैं, लेकिन पूरे गुजरात को कांग्रेस के पक्ष में लाने में असफल साबित हुए।
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इन सीटों पर हुआ था उपचुनाव
बता दें कि गुजरात में 3 नवंबर को कच्छ की अबडासा, सुरेंद्रनगर की लींबडी, मोरबी की मोरबी, अमरेली की धारी, बोटाद की गढडा, वडोदरा की करजण, डांग की डांग और वलसाड की कपराडा सीटों पर उपचुनाव हुआ था। ये सीटें कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं। इन सीटों के नतीजे 10 नवंबर को घोषित किए गए।
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2022 चुनाव पर क्या पड़ेगा असर?
गुजरात उपचुनाव में आठों विधानसभा सीटों पर मिली जीत भाजपा के लिए टॉनिक का काम करेगी। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को इस जीत से मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा। साथ ही, जनता का मूड समझने में मदद मिलेगी। वहीं, कांग्रेस को जीत की संभावनाएं तलाशने के लिए नए सिरे से जमीन तैयार करनी होगी।