राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन-उत्तर प्रदेश की महाप्रबंधक-परिवार नियोजन डॉ. अल्पना का कहना है कि लोगों को लगातार जागरूक करने का प्रयास रहता है कि 'छोटा परिवार-सुखी परिवार' के नारे को अपने जीवन में उतारने में ही सभी की भलाई है। इसके लिए उनके सामने 'बास्केट ऑफ च्वाइस' मौजूद है, उनके फायदे के बारे में भी सभी को अच्छी तरह से अवगत करा दिया गया है।
मातृ एवं शिशु के बेहतर स्वास्थ्य के लिहाज से दो बच्चों के जन्म के बीच कम से कम तीन साल का अंतर अवश्य रखना चाहिए। उससे पहले दूसरे गर्भ को धारण करने योग्य महिला का शरीर नहीं बन पाता और पहले बच्चे के उचित पोषण और स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह बहुत जरूरी होता है। बताया कि इसके लिए लोगों को जागरूक करने के साथ ही उन तक उचित गर्भ निरोधक सामग्री पहुंचाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को भी दक्ष करने का प्रयास किया जाता है।
उनका कहना है कि परिवार नियोजन में स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रदेश के सभी जिलों में उत्तर प्रदेश तकनीकी सहयोग इकाई (यूपी टीएसयू) मदद कर रही है, जिसका प्रयास सराहनीय है।
अपर मुख्य चिकित्साधिकारी आरसीएच डॉ. नंद कुमार ने बताया कि प्रसव के 48 घंटे के अंदर यानि अस्पताल से छुट्टी मिलने से पहले महिला आईयूसीडी लगवा सकती है। एक बार लगने के बाद इसका असर पांच से दस साल तक रहता है।
बच्चों के जन्म के बीच अंतर रखने की यह लंबी अवधि की विधि बहुत ही सुरक्षित और आसान भी है। यह गर्भाशय के भीतर लगने वाला छोटा उपकरण है जो कि दो प्रकार का होता है- पहला कॉपर आईयूसीडी 380 ए- जिसका असर दस वर्षों तक रहता है, दूसरा है- कॉपर आईयूसीडी 375 जिसका असर पांच वर्षों तक रहता है।