बिना कुछ पूछे ही बच्चा बोला, मम्मी हम लोग को छोड़कर बाहर चली जाती थीं। वह सुनील का बेटा था। गुड़िया ने उसे अपनी ओर खींचकर चुप कराया। जैसे वह एक पल भी बर्बाद नहीं करना चाहती थी। आज पहली बार कोई उसका दर्द जानने आया था। अब तक तो वह किसी को कुछ बताना भी चाहती तो कोई सुनने को तैयार नहीं था। गुड़िया बोली-हम लोगों के पास जो भी पैसा, जेवर था सब बेचकर इंसाफ के लिए दौड़ने में खर्च कर चुके हैं। अब जाकर उम्मीद जगी है कि वह बच जाएंगे। महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि बाबू आरोप भी ऐसन बा कि रिश्तेदार भी मदद के नाई आवत बांटे। केतनो कहल जात बा की गलती नाई बा तबो उनके लगत बा कि पुलिस उनहू के पकड़ ली। बहुत झेल लेहली। इ अइसन कानून बा कि केहूं के जिंदगी बर्बाद कर दी।
यह था मामला
करीब दो साल पहले जमीन के विवाद में दूसरे पक्ष ने एक महिला को दलित बनाकर पेट्रोल पंप पर काम करने वाले भाइयों अनिल और सुनील पांडेय पर दलित उत्पीड़न, दुष्कर्म की धारा में केस दर्ज कराया। आरोप था कि वह बर्तन मांजने के लिए बरगदवां आती थी और उस समय ही उसके साथ घटना की गई। दलित उत्पीड़न का मामला होने की वजह से सीओ कैंपियरगंज ने विवेचना की थी। एडीजी के आदेश पर दोबारा जांच हुई तो पता चला कि महिला दलित नहीं मुस्लिम है और वह संतकबीरनगर की रहने वाली है, जहां से रोज आकर बर्तन साफ कर पाना संभव नहीं है। उसकी उम्र भी 55 से ऊपर और एफआईआर में उसने खुद को 35 साल बताया था। दुष्कर्म का मामला गलत पाया गया।
महिला अपराध के मामलों में खासकर, कोई पुलिस वाला रिस्क नहीं लेता। केस दर्ज किया और भेज दिया जेल। जिसे समझना है कोर्ट से समझे? कुछ मामलों में आला अधिकारियों के हस्तक्षेप पर जांच होती है, तब कहीं राहत मिलती है। मामला गलत पाए जाने के बावजूद पुलिस झूठी एफआईआर दर्ज कराने के दोषी पर कार्रवाई नहीं करती। जबकि, झूठा केस करने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन जिम्मेदार अपना काम करना नहीं चाहते हैं।
एडीजी जोन दावा शेरपा ने बताया कि दुष्कर्म, छेड़खानी या अन्य धाराओं में फर्जी केस दर्ज कराने वालों पर कार्रवाई पुलिस को करनी होती है। फर्जी तरीके से फंसाने की कई शिकायतें भी सामने आती हैं। ऐसे मामलों की बारीकी से जांच कराई जाएगी। यदि पुलिसकर्मी की संलिप्तता मिली तो उस पर भी कार्रवाई की जाएगी। सभी एसएसपी या एसपी को इसका पालन सुनिश्चित कराना होगा।