गोरखपुर। बच्चों में हर छोटी-बड़ी बीमारी में एंटीबायोटिक देने की बढ़ती प्रवृत्ति अब खतरनाक साबित हो रही है। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग से जुड़े एक अध्ययन में सामने आया है कि एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन के मामलों में कई सामान्य एंटीबायोटिक्स का असर कम होता जा रहा है। इससे भविष्य में गंभीर संक्रमणों के इलाज पर संकट गहरा सकता है।
अध्ययन के दौरान दो से 59 महीने के बच्चों में जुकाम, गले के संक्रमण और निमोनिया जैसे मामलों की जांच की गई। इसमें पाया गया कि सभी मामलों में बैक्टीरिया जिम्मेदार नहीं होते बल्कि बड़ी संख्या में वायरस भी संक्रमण का कारण बनते हैं। इसके बावजूद एंटीबायोटिक का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इससे दवाओं के प्रति रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ रहा है। शोध में यह भी सामने आया कि क्लेबसिएला निमोनिया जैसे बैक्टीरिया में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस का स्तर अधिक है, जिससे इलाज जटिल हो जाता है। कई आम एंटीबायोटिक्स अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रह गई हैं।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग की अध्यक्ष डॉ. अनीता मेहता ने बताया कि बिना जरूरत एंटीबायोटिक देने से दवाओं का असर कम हो रहा है। इलाज हमेशा जांच और संवेदनशीलता के आधार पर ही होना चाहिए। यदि एंटीबायोटिक का उपयोग नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में सामान्य संक्रमण भी गंभीर रूप ले सकते हैं। ऐसे में जागरूकता और सही चिकित्सा पद्धति अपनाना बेहद जरूरी है।
बीआरडी के अध्ययनकर्ताओं की ओर से 12 महीने तक चले अध्ययन में 167 बच्चों को शामिल किया गया। केवल 31.7 प्रतिशत मामलों में बैक्टीरिया, जबकि 26.9 प्रतिशत में वायरस पाए गए।
एंटीबायोटिक दवाएं क्यों हो रहीं बेअसर
डॉ. अनीता मेहता ने बताया कि बिना जरूरत दवाओं का उपयोग और गलत डोज रेजिस्टेंस बढ़ा रहे हैं। इनके प्रयोग से दवाओं का असर बच्चों के शरीर पर नहीं हो रहा है। इस वजह से उनको ठीक होने में लंबा समय लग रहा है।
शोध में इन दवाओं का असर दिखा कम
अमोक्सिक्लैव, सेफ्ट्रिएक्सोन, कोट्रिमोक्साजोल, ओफ्लॉक्सासिन पर 30-80 प्रतिशत रेजिस्टेंस मिला।