रोजेदारों ने नमाज पढ़कर, कुरआन की तिलावत कर, दुरूद-ओ-सलाम पेश किया
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। माह-ए-रमजान का पांचवां रोजा अल्लाह व रसूल की याद में बीता। रोजेदारों ने इबादत के जरिये अल्लाह को राजी करने की कोशिश की। अल्लाह की खास रहमत बंदों पर उतर रही है। रोजेदारों में गजब का उत्साह है। रोजेदारों ने पूरी दुनिया में अमन-ओ-अमान, अपने और परिवार के लिए दुआ मांगी।
रोजेदारों ने नमाज पढ़कर, कुरआन की तिलावत कर, दुरूद-ओ-सलाम पेश कर, तस्बीह फेर, सदका खैरात कर नेकियां बटोरीं। इफ्तार-सहरी की रौनक बरकरार है। मुफ्ती मुहम्मद शुएब रजा निजामी ने बताया कि दीन-ए-इस्लाम में जकात फर्ज है। जकात पर मोहताज, गरीबों, यतीमों, बेवाओं का हक है जो मालिके निसाब न हों। इसे जल्द से जल्द हकदारों मुसलमानों तक पहुंचा दें, ताकि वह रमजान व ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। अगर आप मालिके निसाब हैं तो हकदार को जकात जरूर दें, क्योंकि जकात न देने पर सख्त अजाब का बयान कुरआन-ए-पाक में आया है। जकात हलाल और जायज तरीके से कमाए हुए माल में से दी जाए।
रमजान का महीना आदर्श जीवन शैली के लिए तय : मो. नदीम
जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के मोहम्मद नदीम ने बताया कि रमजान में हर आदमी अपनी रूह को पवित्र करने के साथ अपनी दुनियादारी की हर हरकत को पूरी तत्परता के साथ वश में रखते हुए केवल अल्लाह की इबादत में समर्पित हो जाता है। अमूमन साल में 11 महीने तक इंसान दुनियादारी में फंसा रहता है। शाहनवाज अहमद ने कहा कि रोजे रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास पर नियंत्रण रखना भर नहीं है। रोजे की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण, अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प और उस पर मुस्तैदी से अमल में बसती है।