वहां दंत चिकित्सा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार ने मरीज की जांच की। स्कैन में पाया गया कि मरीज का निचला जबड़ा पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया था और खोपड़ी की हड्डी निचले जबड़े से जुड़ गई थी। इस कारण उसे सांस लेने और सोने में विशेष परेशानी होती थी। वह नींद में तेज खर्राटे लेता था। इस बीमारी के कारण उसका चेहरा असामान्य रूप ले चुका था
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के दंत विभाग ने लंबे समय से जबड़ों की गंभीर समस्या से जूझ रहे एक मरीज का सफल ऑपरेशन किया है। कुशीनगर के बालुही निवासी 22 वर्षीय युवक के निचले जबड़े की हड्डी पिछले 15 वर्षों से असामान्य रूप से जुड़ी हुई थी।
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मुंह न खुल पाने और ठीक से खाना न खा पाने के कारण वह कुपोषण का शिकार हो गया था। उसका सामान्य जीवन पूरी तरह प्रभावित हो चुका था। खाने, बोलने और मुंह चलाने में उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। परिजनों ने गोरखपुर के निजी अस्पतालों से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक कई जगह उपचार कराया लेकिन सफलता नहीं मिली।
अंततः एम्स गोरखपुर के दंत विभाग ने जटिल सर्जरी कर मरीज की समस्या का स्थायी समाधान किया। बताया गया कि जन्म के कुछ वर्षों बाद ही युवक में यह समस्या शुरू हो गई थी। धीरे-धीरे स्थिति गंभीर होती गई और मुंह से खाना तथा बोलना भी प्रभावित होने लगा।
13 वर्ष की आयु में उसका एक बार निजी अस्पताल में ऑपरेशन भी हुआ, लेकिन कुछ समय बाद समस्या दोबारा उत्पन्न हो गई। परिवारजन निराश होकर दवाओं के सहारे जीवन यापन कर रहे थे। इसी बीच युवक के भाई को जानकारी मिली कि एम्स गोरखपुर में इसका इलाज संभव है।
वहां दंत चिकित्सा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार ने मरीज की जांच की। स्कैन में पाया गया कि मरीज का निचला जबड़ा पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया था और खोपड़ी की हड्डी निचले जबड़े से जुड़ गई थी।
इस कारण उसे सांस लेने और सोने में विशेष परेशानी होती थी। वह नींद में तेज खर्राटे लेता था। इस बीमारी के कारण उसका चेहरा असामान्य रूप ले चुका था। ठोड़ी बहुत पीछे और छोटी रह गई थी, जिससे चेहरे की विकृति स्पष्ट दिखती थी।
जटिल ऑपरेशन हुआ सफल
डॉ. शैलेश ने बताया कि ऑपरेशन से पहले विस्तृत योजना बनाई गई। सर्जरी दो चरणों में की गई। पहले चरण में निचले जबड़े का विकास किया गया, जबकि दूसरे चरण में खोपड़ी और जबड़े की जुड़ी हुई हड्डियों को अलग किया गया। एनेस्थीसिया विभाग के सहयोग से ऑपरेशन की रूपरेखा तैयार की गई।
पहले मरीज को पूरी तरह बेहोश किए बिना, गले के पास सुन्न करके नाक के रास्ते श्वास नली डाली गई। इसके बाद उसे पूर्ण बेहोशी में ले जाकर सर्जरी शुरू की गई। इस दौरान निचले जबड़े की हड्डी को काटकर उसमें एक विशेष उपकरण (डिस्ट्रैक्टर) लगाया गया, जो मुंह के अंदर ही रहता है।
सर्जरी के बाद इस उपकरण को प्रतिदिन लगभग एक मिमी घुमाया जाता था, जिससे हड्डी धीरे-धीरे खिंचती गई और खाली स्थान पर नई हड्डी बनने लगी। जैसे-जैसे जबड़ा आगे बढ़ा, चेहरे का निचला हिस्सा स्पष्ट होने लगा। सांस लेने में सुधार हुआ और खर्राटों की समस्या काफी हद तक कम हो गई।
जनवरी 2026 में दूसरे चरण का ऑपरेशन किया गया। इसमें चेहरे की नसों को सुरक्षित रखते हुए जुड़ी हुई अतिरिक्त हड्डी (एंकिलोज्ड मास) को हटाया गया। साथ ही चेहरे की बनावट को बेहतर बनाने के लिए निचले जबड़े की अग्रिम हड्डी को आकार देकर सामान्य स्वरूप दिया गया।
ऑपरेशन के बाद मिला नया जीवन
डॉ. शैलेश ने बताया कि यदि समय रहते उपचार कराया जाता, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। ऑपरेशन के बाद जबड़ा आगे आने से जीभ के पीछे का स्थान बढ़ गया, जिससे सांस लेने में सुधार हुआ। अब युवक आराम से सो पा रहा है और भविष्य में स्लीप एपनिया जैसी जटिलताओं का खतरा भी कम हो गया है।
उन्होंने बताया कि युवक का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। जहां पहले उसकी ठुड्डी गर्दन से मिली हुई प्रतीत होती थी, अब स्पष्ट और संतुलित जबड़ा दिखाई देता है। वह अब खुलकर मुस्कुरा सकता है और बिना किसी परेशानी के सामान्य जीवन जी रहा है।