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Gorakhpur News: संपत्ति लेकर बेटी ने मां को घर से निकाला..अब वृद्धाश्रम बना सहारा

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समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित वृद्धाश्रम में 114 बुजुर्गों की एक-सी कहानी
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संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। बदलते दौर में रिश्ते किस कदर कमजोर हो रहे हैं, इसका आकलन वृद्धाश्रम पहुंचकर किया जा सकता है। समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित बड़गो झरवां के गोकुलधाम वृद्धाश्रम में रह रहे 103 बुजुर्गों में से किसी को बेटों ने घर से निकाल दिया है तो किसी को बेटी ने। यहां 71 वर्षीया दुर्गा देवी भी हैं, जिन्होंने पति की मौत के बाद घर छोटी बेटी के नाम कर दिया और बाद में उसी ने उन्हें घर से निकाल दिया।
67 साल के बेचन प्रसाद को उनके बेटों ने बेघर कर दिया। बेटों ने नौकरी करने वाली मां को तो साथ रख लिया, लेकिन आर्थिक रूप से तंगहाल पिता को मानसिक बीमार बताकर वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। अब वे यहां झांकने भी नहीं आते।
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वृद्धाश्रम के अधीक्षक राम सिंह निषाद बताते हैं-यहां आने वाले सभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद करते रहते हैं। बातों-बातों में वह अपने बेटे-बेटी की पसंद-नापसंद तक का जिक्र कर देते हैं। फिर उनकी आंखें नम हो जाती हैं। सभी बुजुर्गों की आपबीती एक जैसी है, शायद यही वजह है सब आपस में मिलकर रहते हैं। एक-दूसरे का दुख-दर्द बांटते हैं।
बेटा रहा नहीं..बेटी ने सबकुछ लेकर बेघर कर दिया
गोरखनाथ इलाके के अंसारी रोड की निवासी 71 वर्षीया दुर्गा 2021 में वृद्धाश्रम आई थीं। इनकी चार बेटियां हैं। इनके बेटे और पति राम गुप्ता की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। पति शहर के अच्छे व्यापारी थे। बेटियों की शादी अच्छे घर में हुई है। पति के गुजरने के बाद दुर्गा ने छोटी बेटी और दामाद को अपनी देखरेख के लिए साथ रख लिया। दामाद लेखपाल है। कुछ दिन तक तो सब ठीक रहा, लेकिन जब दुर्गा ने मकान बेटी के नाम कर दिया, इसके बाद से उनके दुर्दिन शुरू हो गए। जिस बेटी को घर सौंपा, उसने ही घर से निकाल दिया। बाकियों ने यह कहकर मदद से इंकार कर दिया कि, जब घर उसे दिया है, तो देखभाल भी वही करेगी। अपनों की बेरुखी से टूटी दुर्गा के लिए यह सब कुछ असहनीय था, लेकिन अब वह वृद्धाश्रम के माहौल में रम चुकी हैं। हालांकि, अब भी वह बेटियों के परिवार की सलामती की दुआ करती हैं।
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बेटे के पास मेरे लिए जगह नहीं
वृद्धाश्रम में माया बाजार के 67 साल के बेचन प्रसाद भी रह रहे हैं। उनका एक ही बेटा है, जो एक बड़े शहर में बड़ी कंपनी में काम करता है। इन्होंने सारा जीवन बेटे और पत्नी की जिम्मेदारी निभाने में लगा दी। पत्नी भी सरकारी नौकरी करती थी। पिछले साल बेटे ने मां को तो साथ रखा, लेकिन बुजुर्ग पिता को मानसिक रूप से बीमार बताते हुए वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। इनसे मिलने के लिए एक दो रिश्तेदार आते रहते हैं, लेकिन बेटा कभी यह जानने भी नहीं आया कि मानसिक रूप से बीमार पिता जिंदा भी हैं या नहीं। बेचन प्रसाद कहते हैं-जीवन भर पाई-पाई जोड़कर बेटे को काबिल बनाया, अब जब बुढ़ापे में मुझे सहारा की जरूरत हुई तो उसने मुंह मोड़ लिया। ऐसे में मरने के बाद श्राद्ध करने का भी कोई मायने नहीं है।
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