इमामबाड़ा एस्टेट के सातवें गद्दीनशीन की जिम्मेदारी सैयद अयान अली शाह के युवा कंधों को सौंपी गई है। तीन सदियों की पुरानी विरासत शुक्रवार को सातवीं पीढ़ी तक पहुंच गई। सबसे पहले राैशन अली शाह फिर अहमद अली शाह ने विरासत संभाली।
इमामबाड़ा एस्टेट के सातवें सज्जादानशीन और गद्दीनशीन के रूप में सैयद अयान अली शाह की ताजपोशी शुक्रवार को की गई। इमामबाड़ा एस्टेट में छठे सज्जादानशीन सैयद अदनान फारूक अली शाह की मौजूदगी में उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई।
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कार्यक्रम के दौरान अयान अली शाह के सिर पर दस्तार (पगड़ी) बांधकर ताजपोशी की रस्म अदा की गई। इस मौके पर दावत-ए- इस्लामी के उलेमा, दरगाह मुबारक खां शहीद कमेटी के सदर इकरार अहमद साथियों के साथ समारोह में पहुंचे और नए गद्दीनशीन का गर्मजोशी से इस्तकबाल किया। सूफियाना अंदाज में उन पर फूलों की बारिश कर मुबारकबाद पेश की गई। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
सातवीं पीढ़ी तक पहुंची तीन सदियों पुरानी रूहानी विरासत
इमामबाड़ा एस्टेट के सातवें गद्दीनशीन की जिम्मेदारी सैयद अयान अली शाह के युवा कंधों को सौंपी गई है। तीन सदियों की पुरानी विरासत शुक्रवार को सातवीं पीढ़ी तक पहुंच गई। सबसे पहले राैशन अली शाह फिर अहमद अली शाह ने विरासत संभाली।
इसके बाद वाजिद अली शाह फिर जव्वाद अली शाह और मजहर अली शाह को जिम्मेदारी मिली। 1984 में अदनान फर्रुख अली शाह के हाथ में कमान पहुंची। करीब 42 साल के बाद अब अयान अली शाह को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। ताजपोशी के बाद गौरवशाली इतिहास पर रोशनी डालते हुए अयान अली शाह ने बताया कि हजरत बाबा रोशन अली शाह वर्ष 1707 ईस्वी में गोरखपुर तशरीफ लाए थे।
उनकी करामात और रूहानी शख्सियत से प्रभावित होकर तत्कालीन शासकों ने उनकी खिदमत में इमामबाड़ा तामीर कराया। उन्होंने बताया कि अवध के नवाब आसिफ-उद-दौला के दौर में वर्ष 1717 से इमामबाड़ा की तामीर शुरू हुई। इसका काम करीब 12 वर्ष चला और 1736 में काम पूरा हुआ।
विरासत सौंपे जाने पर दरगाह मुबारक खां शहीद के सदर इकरार अहमद ने बधाई देते हुए कहा कि नई पीढ़ी के गद्दीनशीन परंपरा को और बेहतर तरीके से आगे बढ़ाएंगे। वहीं इमामबाड़ा मुतवल्लियान कमेटी के अध्यक्ष सैयद इरशाद अहमद ने कहा कि मियां साहब की सेहत को देखते हुए काफी दिन से मांग की जा रही थी। यह फैसला सराहनीय है।
मुहर्रम में होती है जियारत
नवाब आसिफ-उद-दौला ने इमामबाड़े के लिए सोने का ताजिया भेंट किया जबकि उनकी पत्नी ने चांदी का ताजिया भिजवाया। ये दोनों ताजिया आज भी इमामबाड़ा एस्टेट की सबसे अनमोल और ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल हैं। इमामबाड़ा स्टेट में संरक्षित आदमकद सोने और चांदी के ताजिया दुनिया में अपनी तरह के इकलौते माने जाते हैं।
हर वर्ष मुहर्रम के 10 दिन इन्हें जायरीन और अकीदतमंदों की जियारत के लिए खोला जाता है। इसके अलावा बाबा रोशन अली शाह का हुक्का, चिमटा, खड़ाऊं, बर्तन और उनके द्वारा निर्मित लकड़ी का ताजिया भी एस्टेट में सुरक्षित रखा गया है।
इमामबाड़े के चारों विशाल द्वारों में से पूर्वी द्वार वर्षभर खुला रहता है जबकि अन्य सिर्फ मुहर्रम के दौरान खोले जाते हैं। इसी अवधि में यहां ऐतिहासिक मेला भी आयोजित होता है, जिसमें देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और जायरीन पहुंचते हैं।
दर्शन के लिए उमड़ती है भीड़
इमामबाड़ा एस्टेट का शाही जुलूस 5वीं, नौवीं और 10वीं मुर्हरम को निकाला जाता है। इसमें सफेद पैरहन पहने मियां साहब के दर्शन के लिए मुर्हरम में लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसमें करीब 10 किलोमीटर से अधिक का सफर गद्दीनशीन पैदल ही पूरा करते हैं।
शहर के प्रमुख मोहल्ले से गुजरने वाले जुलूस के स्वागत के लिए जगह-जगह इंतजाम किए जाते हैं। पांंचवीं और दसवीं मुहर्रम के जुलूस के दौरान घासीकटरा स्थित कर्बला और खूनीपुर स्थित अंजुमन में मियां साहब का ठहराव होता है, जहां वह कुछ देर आराम करते हैं।
तबीयत खराब होने से बदली विरासत
करीब चार दशक से अधिक समय तक इमामबाड़ा एस्टेट की विरासत संभालने वाले अदनान फर्रुख अली शाह की तबीयत खराब होने के बाद गद्दीनशीन की जिम्मेदारी अयान अली शाह को सौंपी गई। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से वह ही जुलूस की रहनुमाई कर रहे हैं लेकिन उन्हें बाकायदा जिम्मेदारी इस बार सौंपी गई है।
इमामाबाड़ा एस्टेट के मीडिया प्रभारी सैयद शहाब अहमद ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से मियां साहब की तबीयत खराब होने से यह फैसला लिया गया है।
आज से शुरू होगा जुलूसों का सिलसिला
मुर्हरम के जुलूसों का सिलसिला शनिवार से शुरू हो जाएगा। दोपहर में बसंतपुर से शिया समुदाय का मातमी जुलूस निकाला जाएगा। इसके बाद रविवार तड़के विभिन्न मोहल्लों से जुलूस निकाले जाएंगे। वहीं, रविवार को सुबह करीब 9 बजे इमामबाड़ा एस्टेट का शाही जुलूस रवायत के मुताबिक निकाला जाएगा। इसके बाद 10वीं मुर्हरम को दिन में शाही जुलूस और रात में लाइन की ताजिया से जुलूसों का सिलसिला खत्म होगा।