आगे कवि ने स्वाध्याय से अपनी उर्जा गीत की रचना करने में लगा दी। उन्होंने दर्जन भर से अधिक काव्य संग्रह लिखे। हालांकि कई पुस्तकें आज तक प्रकाशित नहीं हो सकी। सन् 1936 में कवि अपनी कालजयी रचनाओं को लोगों को समर्पित कर दुनिया से विदा ले लिया। लेकिन आज भी फागुन मास में जब गायक फाग गीतों की सुरलहरियां छेड़ते हैं। तो कवि की रचनाएं रंगो की फुहार बनकर श्रोताओं पर बरसने लगती हैं।
लोग कवि रंगपाल को फाग कवि के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। लेकिन फाग गीतों के बावजूद उन्होने देशभक्ति, खेमटा, दादरा, कजरी, सोहर, तितला, ठुमरी, झपताल आदि गीतों की भी रचना की है। कवि का पूरा जीवन उस समय बीता जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था।
इसलिए कवि के गीतों में गुलामी की टींस दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में छत्रसाल की वीरता और महारानी पद्मावत की वीरगाथा है। देशभक्ति की रचनाओं में ....मौलमणि सब देशों का हिंद। इस गीत में देश के सौंदर्य का बड़ा मनोरम वर्णन है।
नगर पंचायत हरिहरपुर में कवि रंगपाल के समकालीन और भी कवि थे। जो कवि रंगपाल को अपना आदर्श मानते थे और उनकी रचनाओं का संग्रह करने का भी कार्य करते थे। उन्हीं कवियों में बद्री प्रसाद पाल, आद्या प्रसाद पांडेय, मातादीन त्रिपाठी दीन, शिवबदन चतुर्वेदी, राम भरोस पांडेय सूर्य और राधेश्याम श्रीवास्तव हरिहरपुरी थे। कवि रंगपाल की मृत्यु के बाद उनके शोक में कवि आद्या प्रसाद पांडेय ने सूर्यास्त नामक शीर्षक से कविता भी लिख डाली थी ।
हर साल बीस फरवरी को नगर में मनाई जाती है कवि की जयंती
कवि रंगपाल की जयंती हर साल बीस फरवरी को मनाई जाती है। पाल सेवा संस्थान द्वारा आयोजित कवि की जयंती पर दूर दराज से आए गायक कवि के लिखे फाग के राग से समां बांध देते हैं। पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष व पूर्व चेयरमैन बृजेश पाल की अगुआई में दिनभर कवि के गीतों का लोग आनंद उठाते हैं।
कवि की रचनाएं जो नहीं हो सकी प्रकाशित
डाक्टर मुनिलाल उपाध्याय "सरस" के अनुसार कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक कवि थे । उनकी रचनाओं में रीतिबद्ध श्रंगार और श्रंगारबद्ध भक्ति का प्रयोग है । उनकी प्रकाशित रचनाओं में अंगादर्श,रसिकानंद,सज्जनानंद,प्रेम लतिका,शांत रसार्णव,रंग उमंग,गीत सुधानिधि आदि हैं । उनकी कई रचनाएं आज तक प्रकाशित नहीं हुई जिनमें रंग महोदधि,ऋतु रहस्य,नीति चंद्रिका,छत्रपति शिवाजी,वीर विरूद,गो दुर्दशा,दोहावली,दर्पण,खगनामा,फूलनामा मित्तू विरह आदि हैं।