वर्ष 1941 में पेपे किसी किसान को लगान के मामले में पिटाई कर रहे थे। अचानक उनकी चलाई छड़ी बगल में चहल कदमी कर रहे डॉन को लग गई, जिस पर वह काफी चीखने लगा। यह देख उन्होंने किसान को छोड़ दिया और डॉन की सेवा में लग गए।
डॉन अपने मालिक की चोट से कम उनके क्रूर व्यवहार से अधिक दुखी था। इसके बाद वह बीमार रहने लगा और 1942 में वह मौत की आगोश में चला गया। डॉन की मौत से डब्ल्यू पेपे बहुत सदमे में थे। इसके बाद उनमें काफी बदलाव आ गया। उन्होंने किसानों पर जुल्म ढाना बंद कर दिया।
हालत यह हुई कि आजादी के बाद जब वह इंग्लैंड लौटने लगे तो उन्होंने अपनी जमींदार की जमीनें लोगों को सांकेतिक मूल्य पर उन्होंने देनी शुरू कर दी, जो कुछ दे पाने में अक्षम थे, उन्हें भी जमीनें रजिस्ट्री कर दी।
डब्ल्यू पेपे आज नहीं है, मगर इस क्षेत्र की जनता उनके हृदय परिवर्तन के चलते आज भी अंग्रेज साहब कहकर याद करती है। बर्डपुर स्थित डाकबंगले के पास उनके कुत्ते की मजार इस बात की गवाह है कि उस मासूम जानवर की पीड़ा ने किस प्रकार उनकी जीवनधारा बदल दी।