कोरोना वायरस ने औद्योगिक जगत की तस्वीर भी बदल दी है। कभी क्रेडिट (उधार) पर चलने वाला औद्योगिक जगत एडवांस में चलने लगा है। उद्योगों में सिर्फ उतना ही उत्पादन किया जा रहा है जितना बाजार से मांग हो रही है। एक तरह से वैश्विक महामारी के एक साल पूरा होने के बाद भी औद्योगिक जगत कोरोना की चोट से उबर नहीं सका है। स्थिति यह है कि अभी तक उत्पादन 60-70 फीसदी पहुंचकर थम गया। रही सही कसर कच्चे माल की कीमतों में हुए इजाफे ने पूरी कर दी। इधर, वायरस के संक्रमण के लगातार बढ़ते मामलों से उद्यमियों में फिर से दहशत है।
करीब एक साल पहले कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन के बाद तीन महीने तक सारे उद्योगों के पहिए थमे रहे। उत्पादन बिल्कुल शून्य हो गया। स्थितियां यह हो गईं कि कई औद्योगिक इकाइयों को अपने कर्मचारियों को वेतन देने लायक रकम नहीं बची। कई लोगों को तो रोजगार से भी हाथ धोना पड़ा। दिन प्रति दिन स्थितियां बिगड़ती ही गईं। विभिन्न चरणों में बाजार तो खोल दिए गए लेकिन उद्योगों को अनुमति नहीं दी गई।
ऐसे में उद्यमियों के सामने दोहरी मुश्किल पैदा हो गई। उद्योग ठप होने की वजह से उनकी आमदनी पूरी तरह से शून्य हो गई। खुद का खर्च चलाने के लिए कई तरह की मशक्कत करनी पड़ी। ऐसे में औद्योगिक जगत की ओर से कुछ शर्तों के साथ उद्योगों को संचालित करने के लिए छूट देने की मांग उठने लगी।
सरकार ने कुछ शर्तों के साथ विभिन्न चरणों में औद्योगिक इकाइयों को संचालित करने की अनुमति प्रदान की। जून-जुलाई में जब उद्योगों को पूरी तरह से संचालित करने की अनुमति मिली तो उद्योगों के पहिए कुछ तेजी से घूमने शुरू हुए। इधर मांग नहीं होने की वजह से उद्योगों की रफ्तार फिर सुस्त पड़ती नजर आ रही है। आज वैश्विक महामारी के एक साल पूरा होने के बाद भी औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार 100 फीसदी नहीं हो सकी है।
बाजार नहीं पकड़ पा रहा है रफ्तार
दरअसल औद्योगिक उत्पादन पूरी तरह से बाजार पर निर्भर है। अगर मांग ज्यादा है तो उत्पादन भी उसी के अनुपात में होता है। लेकिन महामारी आने के बाद से लेकर अब तक बाजारों में खरीद की रफ्तार थम सी गई है। दिवाली के अलावा शादी के सीजन में भी बाजारों में पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम खरीदारी हुई है। ऐसे में गोरखपुर के उद्यमियों ने अपनी-अपनी फैक्ट्रियों में उत्पादन को 60-70% तक सीमित कर दिया है।
खरीद से लेकर बिक्री तक की ट्रेंड में आ गया है बदलाव
वायरस के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए ज्यादातर लोगों ने व्यक्तिगत रूप से मिलना-जुलना कम कर दिया है। लिहाजा फैक्ट्रियों के द्वारा कच्चा माल मंगाने से लेकर तैयार उत्पादों की बिक्री तक के ट्रेंड में बदलाव आ गया है। ज्यादातर फैक्ट्रियों में कच्चा माल न सिर्फ ऑनलाइन मोड में ही उपलब्ध कराया जा रहा है बल्कि रकम भी एडवांस ली जा रही है।
वैश्विक महामारी के बाद से सबसे ज्यादा बदलाव पैसों के लेन-देन में आया है। सभी तरह के कच्चे मालों की आपूर्ति एडवांस पेमेंट के बाद ही हो रही है। अगर दिए गए एडवांस की तुलना में कच्चे माल की कीमत ज्यादा होती है तो आपूर्ति रोक दी जाती है। जब तक पूरा पैसा का ऑनलाइन भुगतान नहीं कर दिया जाता है तब तक कच्चे माल की आपूर्ति नहीं होती है।
इसकी वजह से तकरीबन सभी फैक्ट्री संचालकों को भी उधारी लेन-देन के प्रचलन को बहुत ही कम कर दिया गया है। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि क्रेडिट (उधारी) का सिस्टम खत्म होने की कगार पर है। वहीं माल का उत्पादन भी कम कर दिया गया है क्योंकि डिमांड भी बेहद कम हो गई है। -आरएन सिंह, निदेशक, वेल्ड इंडिया
अभी तक औद्योगिक जगत कोरोना की मार से उबर नहीं सका है। तकरीबन सभी औद्योगिक इकाइयों में 60 से 80 प्रतिशत ही उत्पादन हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि कोरोना के बाद से बाजार में जितनी डिमांड होती थी उसमें काफी कमी आ गई है। लिहाजा उद्योगों को भी अपने उत्पादन में कटौती करनी पड़ी है। अब तो फिर से वायरस के संक्रमण के मामले बढ़ने लगे हैं। महाराष्ट्र समेत देश के कुछ अन्य राज्यों में फिर से लॉकडाउन लग रहे हैं। ऐसे में अगर फिर से पिछले साल जैसी स्थिति आती है तो औद्योगिक जगत के लिए काफी नुकसानदायक साबित होगा। इसकी भरपाई होने में वर्षों लग सकते हैं। -एसके अग्रवाल, पूर्व अध्यक्ष, चेंबर ऑफ इंडस्ट्रीज
वायरस का सबसे ज्यादा असर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों की फैक्ट्रियों पर पड़ा है। वहां पर अब तक पर्याप्त संख्या में श्रमिक नहीं है। मांग कम होने की वजह से छोटी फैक्ट्रियां अब तक शुरू नहीं हो सकी है। जिसकी वजह से किसी भी बड़े उत्पाद वाली फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले छोटे उत्पादों की आपूर्ति प्रभावित है। सिलाई मशीन से संबंधित पार्ट्स नहीं मिल पा रहे हैं जिसकी आपूर्ति लुधियाना से होती थी। डिमांड के बावजूद भी सामान की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। -सनूप साहू, एमडी, साहू समूह