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गोरखपुर: सऊदी अरब में ड्रोन हमले में कमलेश की मौत, पिता की गुहार- बेटा लौट आ...सुनीता अब किसके सहारे जिएगी

Sun, 25 Oct 2026 02:54 PM IST
अनुराग रंजन अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर

सार

घर पहुंचने वाले रिश्तेदार और ग्रामीण परिवार को ढांढस बंधा रहे हैं, लेकिन अपनों को खोने का दर्द किसी सांत्वना से कम नहीं हो रहा। परिजन चाहते हैं कि प्रक्रिया में तेजी लाई जाए, ताकि बेटे और पति का अंतिम दर्शन करने की उनकी आस पूरी हो सके।
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मायूस बैठे कमलेश की पत्नी और बच्चे - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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घर के आंगन में बेटे की राह देखती आंखें अब उसके लौटने की आस में दरवाजे पर टिकी हैं। फर्क बस इतना है कि इस बार बेटा खुद चलकर नहीं आएगा। सऊदी अरब के दम्माम एयरपोर्ट पर ड्रोन हमले में जान गंवाने वाले किशुनपुर बगही निवासी कमलेश पांडेय के घर में हर तरफ सन्नाटा और सिसकियां हैं। पिता हरिश्चंद्र पांडेय की आंखों से आंसू थम नहीं रहे। किसी तरह खुद को संभालते हुए कहते हैं-बेटा एक बार लौट आ...सुनीता अब किसके सहारे जिएगी।
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हरिश्चंद्र पांडेय के लिए बेटे को खोने का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है। कमलेश उनका बड़ा बेटा था और परिवार की आजीविका का प्रमुख सहारा भी। बेटे ने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए विदेश में नौकरी की। पिछले दिसंबर में बहन की शादी कराई और अपनी गृहस्थी के साथ माता-पिता की जिम्मेदारियां भी निभाता रहा। अब उसी बेटे की मौत ने बुजुर्ग पिता को इस उम्र में ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां आगे का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा।

फोन पर आखिरी बातचीत, फिर जिंदगी में छा गया अंधेरा
पत्नी सुनीता देवी को वह आखिरी बातचीत बार-बार याद आ रही है, जो हमले से कुछ देर पहले ही पति से हुई थी। उस समय कमलेश सामान्य और खुश थे। उन्होंने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने और उनके भविष्य को लेकर चिंता नहीं करने की बात कही थी। यह कहते हुए सुनीता देवी की आंखें भर आईं। बोलीं, मेरा तो संसार ही उजड़ गया। अब मेरी और मेरी दोनों बेटियों की जिंदगी कैसे कटेगी? मैं बस एक बार अपने पति का चेहरा देखना चाहती हूं। सरकार से गुहार है कि उनका पार्थिव शरीर जल्द घर पहुंचा दिया जाए।
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बेटियों के सपनों में अब भी जिंदा हैं पापा
कमलेश की बेटियां तन्वी और तान्या भी पिता को याद कर भावुक हो जा रही हैं। वे कहती हैं- पापा हमेशा उनसे मन लगाकर पढ़ाई करने के लिए कहते थे। वह चाहते थे कि हम दोनों पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हों और जीवन में अच्छा मुकाम हासिल करें। हमेशा हमारी फिक्र करते थे और वे विदेश में नौकरी करते हुए बेहतर भविष्य के सपने संजोते थे। आज बेटियों के सामने पिता की कमी के साथ आगे की पढ़ाई और भविष्य की चिंता भी है। जिस पिता की हौसला बढ़ाने वाली बातें उन्हें मुश्किलों से लड़ना सिखाती थीं, अब वही आवाज सुनने के लिए वे तरस रही हैं।

बेटे के लौटने की आस में टकटकी लगाए बैठे पिता
हरिश्चंद्र पांडेय और परिवार के अन्य सदस्य कमलेश के पार्थिव शरीर के भारत आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पिता की इच्छा है कि बेटे को आखिरी बार देख सकें और अपने हाथों से अंतिम विदाई दे सकें। मां शैला देवी का भी रो-रोकर बुरा हाल है। घर पहुंचने वाले रिश्तेदार और ग्रामीण परिवार को ढांढस बंधा रहे हैं, लेकिन अपनों को खोने का दर्द किसी सांत्वना से कम नहीं हो रहा। परिजन चाहते हैं कि प्रक्रिया में तेजी लाई जाए, ताकि बेटे और पति का अंतिम दर्शन करने की उनकी आस पूरी हो सके।

विदेश मंत्री को पत्र, परिवार को मदद का इंतजार
कमलेश का पार्थिव शरीर भारत लाने और परिवार को आर्थिक सहायता दिलाने की मांग को लेकर परिजन बांसगांव के सांसद एवं केंद्रीय राज्यमंत्री कमलेश पासवान से मिले थे। सांसद ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर को पत्र लिखकर आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया है। शनिवार को तहसील के कर्मचारी भी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। कांग्रेस श्रम प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव गया प्रसाद ने भी परिजनों से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया और पार्थिव शरीर जल्द भारत लाने की मांग की। परिवार की मांग है कि कमलेश का पार्थिव शरीर जल्द गांव लाया जाए और नियमानुसार आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। इससे पत्नी और बेटियों के भरण-पोषण तथा पढ़ाई की चिंता कुछ कम हो सकेगी।
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