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Gorakhpur News: सुकून की नींद के लिए जला रहे 'धीमा जहर'

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10 रुपये वाली अगरबत्ती सेहत के लिए खतरा, शासन ने दिए कार्रवाई के निर्देश
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अगरबत्तियों में अपंजीकृत कीटनाशक मैपरफ्लूट्रिन और डैमीफ्लूट्रिन के इस्तेमाल की आशंका


गोरखपुर। मच्छरों से बचने और सुकून की नींद पाने के लिए लोग जिस मच्छर अगरबत्ती पर भरोसा कर रहे हैं, वही अब उनकी सेहत के लिए खतरा बनती जा रही है। इसका धुआं फेफड़ों को प्रभावित कर रहा है। महज 10 रुपये में मिलने वाली ये अगरबत्तियां शहर से लेकर गांव तक की किराना दुकानों पर आसानी से उपलब्ध हैं। पंजीकृत कीटनाशकों के इस्तेमाल की आशंका सामने आने के बाद शासन ने इनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
शुक्रवार को मोहद्दीपुर स्थित एक दुकान पर मांगने पर यह अगरबत्ती आसानी से उपलब्ध मिली। इसी तरह शहर के अन्य इलाकों की कई दुकानों पर भी मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियां खुलेआम बेची जा रही हैं। मच्छरों से राहत पाने की मजबूरी और केवल 10 रुपये की कीमत होने के कारण ग्राहक भी इनके संभावित दुष्प्रभावों पर ध्यान नहीं दे रहे। इस कारोबार का सालाना टर्नओवर करोड़ों रुपये का बताया जाता है।
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जानकारी के अनुसार, इन अगरबत्तियों में अपंजीकृत कीटनाशक मैपरफ्लूट्रिन और डैमीफ्लूट्रिन का प्रयोग किया जा रहा है। ये वही रसायन है जो मच्छर मारने वाले उत्पादों में पाए जाते हैं। मामला सामने आने के बाद शासन ने प्रदेश के सभी कृषि विभाग के अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके बाद कृषि रक्षा विभाग की टीम ने विभिन्न स्थानों से नमूने लेकर जांच के लिए भेजे हैं।

रोजाना बिक रही 15 से 20 लाख रुपये की अगरबत्ती
किराना दुकानदार संजय गुप्ता बताते हैं कि मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियां ग्राहकों में काफी लोकप्रिय हैं। छोटी से बड़ी हर दुकान पर इनकी मांग रहती है। गोरखपुर में प्रतिदिन करीब 15 से 20 लाख रुपये की मच्छर अगरबत्ती बिकती है। बरसात के मौसम में इसकी मांग और बढ़ जाती है।

एक अगरबत्ती का धुआं 50 सिगरेट के बराबर नुकसानदेह
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के टीबी एवं चेस्ट विभाग के अध्यक्ष डॉ. अश्वनी मिश्रा बताते हैं कि बंद कमरे में मच्छर अगरबत्ती का धुआं लंबे समय तक रहने पर सांस के जरिए सीधे शरीर में पहुंचता है। एक अध्ययन में पाया गया है कि एक मच्छर अगरबत्ती का धुआं 50 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान पहुंचा सकता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी, सांस लेने में परेशानी, एलर्जी, सिरदर्द और अस्थमा के मरीजों की दिक्कतें भी बढ़ सकती हैं।उन्होंने बताया कि ओपीडी में कई ऐसे मरीज आते हैं जो धूम्रपान नहीं करते फिर भी उनके फेफड़ों में तारकोल जैसी परत जम जाती है। उनका कहना है कि मच्छर अगरबत्ती के इस्तेमाल से बचना चाहिए।
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शासन के निर्देश पर कंफर्ट और स्लीपवेल ब्रांड की मच्छर अगरबत्तियों के नमूने लिए गए हैं। इन्हें जांच के लिए भेजा गया है। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। दुकानदारों से इन उत्पादों की बिक्री और भंडारण नहीं करने की अपील भी की गई है।
- आरडी वर्मा, जिला कृषि रक्षा अधिकारी
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