विभिन्न जांच एजेंसियों के साथ जिले की एलआईयू, पुलिस (नक्सल विंग) की जांच में कहा गया है कि वार्ड नंबर 4, गढ़वा चौक, थाना पिपराइच, जनपद गोरखपुर में स्थित है। इसका कुल रकबा 29 डिसमिल (अराजी संख्या 619/117) विवादित है। (अमर उजाला इसकी पुष्टि नहीं करता, जांच रिपोर्ट के आधार पर) इस भूमि पर स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले से कानूनी विवाद चल रहा है।
पिपराइच थाना क्षेत्र में जमीन के विवाद में हुई दो पक्षों के बीच मारपीट के मामले में पुलिस ने बिना जांच के तहरीर के आधार पर ही रोहिंग्या के खिलाफ केस दर्ज कर लिया। एजेंसियों ने जांच की तो मामला जमीन के विवाद का निकला। जांच में रोहिंग्या की पुष्टि नहीं होने से पिपराइच पुलिस की खूब किरकिरी हो रही है। एजेंसियों ने शासन को सौंपी रिपोर्ट में साफ-साफ लिख दिया है कि इस मामले में रोहिंग्या के किसी तरह के प्रमाण नहीं मिले हैं।
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चाहरदीवारी के निर्माण से शुरू हुई रार
सूत्रों के मुताबिक, एजेंसियों की जांच में सामने आया है कि पिपराइच में जमीन के विवाद को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था। इसमें एक पक्ष पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष का था। इन्हीं की तहरीर पर पिपराइच थाने में केस दर्ज किया गया था।
जांच में पता चला कि एक मार्च 2025 को पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष अनुपमा आर्य, उनके पति मुरारीलाल, पुत्र सूर्यांश गुप्ता को सूचना मिली कि दूसरे पक्ष के शहनवाज अपने एक पुराने किसी मुस्लिम पक्षकार के साथ विवादित भूमि पर चहारदीवारी का निर्माण करवा रहे हैं।
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सूचना मिलते ही अनुपमा आर्य अपने परिवार के साथ मौके पर पहुंचीं और निर्माण रोकने के लिए कहा। इसके बाद दोनों पक्षों में बहस शुरू हो गई। बाद में हाथापाई हो गई। इसमें अनुपमा आर्य, उनके पति, बेटे और शहनवाज को चोटें आई थीं।
घटना की सूचना मिलने पर पिपराइच पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों पक्षों के लोगों को थाने लेकर आई। यह पूरा प्रकरण घटनास्थल पर मौजूदा लोगों ने भी देखा। पुलिस और एजेंसियों को बाद में उनसे ही सच पता भी लगा।
झोपड़ी वालों को बता दिया रोहिंग्या..बिना जांच के केस भी
पुलिस ने मुरारीलाल, शहनवाज और मुस्लिम पक्षकार के विरुद्ध बीएनएसएस की धारा 126/135 के तहत कानूनी कार्यवाही की। दोनों पक्षों से कहा कि समाधान दिवस के दौरान राजस्व अधिकारी एवं अन्य कानूनी अधिकारियों के समक्ष भूमि स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करें।
दो मार्च को अनुपमा आर्य ने थाना पिपराइच में एक नई शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि अस्थायी झोपड़ियों में वर्षों से रह रहे कुछ संदिग्ध रोहिंग्या इस विवाद में शामिल थे। रोहिंग्या सुनते ही मामला तूल पकड़ता गया।
मामले की जांच किए बिना पिपराइच पुलिस ने उसी तारीख में तहरीर के आधार पर मुकदमा संख्या 159/25 दर्ज करवा दिया। इसमें धारा 191 (2), 110, 131, 115 (2) एवं 353 बीएनएसएस के तहत मजीद, शहनवाज, रमजान, शोएब, पुन्नू एवं करीब 50 अज्ञात रोहिंग्या के विरुद्ध केस पंजीकृत किया गया। एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जांच में तहरीर और तत्काल अज्ञात रोहिंग्या दिखाते हुए केस दर्ज किया जाना हैरतभरा है।
एलआईयू जांच में खुला जमीन का खेल
सूत्रों के मुताबिक, विभिन्न जांच एजेंसियों के साथ जिले की एलआईयू, पुलिस (नक्सल विंग) की जांच में कहा गया है कि वार्ड नंबर 4, गढ़वा चौक, थाना पिपराइच, जनपद गोरखपुर में स्थित है। इसका कुल रकबा 29 डिसमिल (अराजी संख्या 619/117) विवादित है। (अमर उजाला इसकी पुष्टि नहीं करता, जांच रिपोर्ट के आधार पर) इस भूमि पर स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों के बीच पहले से कानूनी विवाद चल रहा है।
हालांकि, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष की ओर से दर्ज कराए गए केस में भूमिधर 626/1 का जिक्र है। इस जमीन पर अवैध निर्माण कराए जाने को लेकर शहनवाज, रमजान, शोएब, पुन्नू एवं करीब 50 अज्ञात रोहिंग्या के विरुद्ध केस पंजीकृत कराया गया है।
डीएम की टीम की जांच रिपोर्ट और दर्ज केस में अंतर
जिलाधिकारी की ओर से गठित टीम ने इस संबंध में जांच रिपोर्ट 2024 में सौंपी थी। इसकी आराजी संख्या ( 619/117) है। हालांकि इस जांच में प्रशासनिक टीम की आराजी संख्या और केस दर्ज में आराजी संख्या दोनों अलग- अलग हैं। एजेंसियों ने जांच में पाया है कि जिला प्रशासन की टीम ने नवंबर 2024 में जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसी जमीन का एक हिस्सा यह भी है।
हालांकि, कुछ दिनों पहले एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान गणेश कुमार अग्रवाल नामक शख्स ने दावा करते हुए कहा कि जिस जमीन की बात हो रही है, वह 619 आराजी संख्या की है। जबकि पूर्व चेयरमैन का दावा है कि जमीन की आराजी 626 है। अगर समाधान दिवस के दिन दोनों पक्ष संबंधित प्रपत्रों के साथ मौके पर पहुंचते तो जमीन का विवाद भी सुलझ जाता।
तीन-चार वर्षों से रह रहे थे नट बिरादरी के लोग
सूत्रों की मानें तो प्रशासनिक एवं अलग-अलग एजेंसियों की जांच में पिपराइच क्षेत्र में किसी रोहिंग्या के मौजूद होने की पुष्टि नहीं हुई। जांच में सामने आया था कि रेलवे डिपो के आसपास तकरीबन 15 झोपड़ियों में कुछ नट बिरादरी के लोग (जिसमें अधिकतर हिंदू, कुछ मुस्लिम परिवार भी) पिछले तीन-चार वर्षों वर्षों से रह रहे थे।
ये मुख्य रूप से कबाड़ बीनने के अलावा घरों में साफ-सफाई का काम और मजदूरी करते थे। पुलिस की ओर से केस दर्ज किए जाने के बाद और देश-प्रदेश की एजेंसियों की जांच शुरू होते ही ये सभी जगह छोड़ कर यहां से चले गए हैं।