गोरखपुर। किराएदारी पर लगने वाले स्टांप शुल्क और रजिस्ट्रेशन शुल्क में छूट से छोटे और मझोले दुकानदारों व सामान्य परिवार के किराएदारों को बड़ी राहत पहुंच है। नए नियम के लागू होने से रजिस्टर्ड एग्रीमेंट भी करीब 20 फीसदी बढ़ गए हैं। विशेषज्ञ की राय है कि इससे कानूनी विवाद भी कम हो जाएंगे।
दरअसल, पहले पट्टा विलेख पर किराए के मूल्यांकन का चार फीसदी (नगर) या दो फीसदी (ग्रामीण) स्टांप शुल्क लगता था। इसके अतिरिक्त एक फीसदी रजिस्ट्रेशन शुल्क भी देय होता था। अब स्लैब तय कर दिया गया है। अब 2 लाख रुपये तक एक साल के लिए अधिकतम 1,000 रुपये और पांच साल के लिए दो हजार रुपये कर दिया गया है। इस नई व्यवस्था से अधिकतम 1,74,000 रुपये तक की बचत हो सकती है।
यह लाभ उन पट्टों को मिलेगा जिनका औसत वार्षिक किराया 10 लाख रुपये या उससे अधिक है और अवधि छह से 10 वर्ष है। छोटे एवं मध्यम पट्टों को प्रतिशत में सबसे अधिक लाभ होगा। दो लाख रुपये से 10 लाख रुपये वार्षिक किराये वाले पट्टों पर 80 फीसदी से 87 फीसदी तक की बचत दर्ज की जाएगी। 10 लाख रुपये तक के किराये वाले पट्टों में प्रीमियम या अग्रिम धन पर अलग से शुल्क न लगने से भी बड़ी राहत मिलेगी।
सदर तहसील के आंकड़ों के मुताबिक, प्रथम अनुभाग में इस वर्ष जुलाई में 26, अगस्त में 21 और सितंबर में 23 एग्रीमेंट हुए थे। लेकिन अक्तूबर में 14 दिनों में ही 15 एग्रीमेंट हो चुके हैं। यह आंकड़ा धीरे-धीरे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
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ऐसे समझिए छूट का हिसाब
अगर छोटी दुकान या मकान है और प्रति माह पांच हजार रुपये किराया है तो एक वर्ष के लिए एक हजार रुपये स्टांप और एक हजार रजिस्ट्रेशन शुल्क देना होगा। पहले 7,200 का स्टांप और 1,800 रुपये शुल्क देना पड़ता था। इसलिए ज्यादातर लोग एग्रीमेंट नहीं कराते थे फिर किराएदारी को लेकर विवाद होता था।
कोट
नए पट्टा विलेख पर स्टांप शुल्क और रजिस्ट्रेशन शुल्क में छूट से एग्रीमेंट कराने वालों की संख्या बढ़ेगी। इससे विवाद कम होंगे।
-ब्रजेश पाठक, एआईजी-स्टांप एवं पंजीयन (निबंधन)
कोट
किराएदार और मकान मालिक दोनों का हित सुरक्षित पट्टा विलेख में छूट होने के बाद अब एग्रीमेंट कराने वालों की संख्या बढ़ने लगी है। इससे किराएदार और मकान मालिक दोनों का हित सुरक्षित रहेगा। छोटे और मध्यम वर्ग के लोगों को इसके लिए ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ेगा। इसके बारे में लोग पूछने आ रहे हैं, उन्हें स्लैब दिखाकर समझाया जा रहा है।
-उपेंद्र धर दुबे, अधिवक्ता