23 सितंबर बुधवार को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट पर राहु, वृष तथा केतु भी अपनी-अपनी उच्च राशि वृश्चिक में प्रवेश करेंगे। इससे ये सार्वभौमिक परिवर्तन का योग बनाएंगे जिससे पूर्व से जो स्थिति है उसमें सुधार प्राप्त होगा। युद्ध के जो आसार दिखाई दे रहे थे वे समाप्त होंगे।
वहीं महामारी की वृद्धि दर पर भी अंकुश लगेगा। आपसी सौहार्द में वृद्धि होगी। भारतीय विद्वत महासभा के प्रवक्ता पंडित शरद चंद्र मिश्र ने राहु और केतु के राशि परिवर्तन का विभिन्न राशियों पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में विस्तार से बताया।
- मेष राशि- घर एवं व्यवसाय में तनावपूर्ण स्थितियां, व्यर्थ खर्च, शरीर में कष्ट-रोग और मानसिक परेशानियां होंगी, शत्रु भय और विद्याध्ययन में अड़चनें आएंगी।
- वृष राशि- निकट बंधुओं से विरोध ,बनते कार्य मे अड़चनें, रोग और शत्रु भय लेकिन अचानक धन प्राप्ति भी हो सकती है।
- मिथुन राशि- बनते कार्य में अवरोध, दौड़ धूप, अधिक खर्च, रोग बीमारियों से धन व्यय, तनाव और मन अशांत रहेगा।
- कर्क राशि- कुछ बिगड़े कार्यों में सुधार होगा, भूमि-वाहन का सुख, धन लाभ और विदेश गमन का सुयोग बनेगा।
- सिंह राशि- व्यर्थ की दौड़-धूप ज्यादा रहेगी, प्रगति के कार्यों में अवरोध, गुजारे योग्य आय के साधन, उलझन और मन अशांत रहेगा।
- कन्या राशि- उलझने रहेंगी लेकिन आय भी होती रहेगी, आय के साधन मिलेंगे, वाहन सुख उत्तम रहेगा।
- तुला राशि- लाभ कम खर्च अधिक होगा, शारीरिक कष्ट, मित्रों से वैचारिक मतभेद, अपने ही पराया जैसा व्यवहार करेंगे।
- वृश्चिक राशि- बनते कार्य में अवरोध, लाभ कम-व्यय ज्यादा होगा, तनाव, जीवन साथी से वैचारिक मतभेद।
- धनु राशि- अचानक धन लाभ, अपनों से मेल-मिलाप में वृद्धि, व्यवसाय मे सफलता मिलेगी, सफल यात्रा का सुयोग बनेंगे।
- मकर राशि- निकट संबंधियों से कलह, क्लेश, रोग, खर्च भय, संतान पक्ष से कष्ट मिलेगा।
- कुम्भ राशि- व्यवसाय मे पूर्ण संघर्ष रहेगा, आय सीमित व्यय ज्यादा, संघर्ष और मानसिक अशांति रहेगी।
- मीन राशि- पराक्रम और उत्साह में वृद्धि, यात्रा योग बनेगा, धन लाभ, पदोन्नति, विदेश यात्रा के योग।
कौन थे राहु और केतु
पंडित, आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिकों के अनुसार राहु और केतु नामक ग्रहों का सौर परिवार में कोई अस्तित्व नहीं है। ये उत्तर और दक्षिण ध्रुवों की छाया मात्र हैं, इसीलिए इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। पुराणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार राहु की माता का नाम सिंहिका है जो हिरण्यकषिपु की पुत्री थीं तथा उनका विवाह विप्रचत्ति नामक दानव से हुआ अर्थात राहु दैत्यराज हिरण्यकशिपु का नाती था।
जब देवता और दानवों ने मिलकर समुद्रमंथन किया और उसमें से प्राप्त अमृत को वितरण के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर दानवों को मोहित कर देवताओं को अमृत वितरित करने का प्रयास किया, तब राहु यह बात जानकर देवताओं का रूप बनाकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और अमृत पाने में सफल हो गया।
यह घटना सूर्य और चंद्रमा देख रहे थे। उन्होंने भगवान विष्णु को इस बात की सूचना दे दी। इस पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन से राहु के मस्तक को काट दिया। लेकिन अमृत पान के कारण वह अमर हो गया। दो भागों मे विभक्त होने से वह मरा नहीं, उसके सिर और धड़ दोनों जीवित रहे। जिसमें से सिर वाले भाग को राहु एवं धड़ वाले भाग को केतु कहा गया। तब से राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा से शत्रुता रखते हैं, समय-समय पर ग्रहण के रूप में उनके रास्ते में आते हैं।