गोरखपुर। केवाईसी के नाम पर आधार-पैन लेकर फर्जी बैंक खाते खोलकर ठगी करने वाले गिरोहों पर अब साइबर सेल ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। शिवरिया निवासी सुधाकर यादव के दस्तावेज लेकर उसके नाम से खाता खोलने और संदिग्ध लेनदेन का मामला सामने आने के बाद साइबर सेल और थाने की टीम डिजिटल साक्ष्य जुटाने में लगी है। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में तकनीकी जांच ही सबसे बड़ा हथियार है।
साइबर सेल के सूत्रों के अनुसार, साइबर सेल टीम गैंग तक पहुंचने के लिए छात्र के बैंक खाते की पूरी केवाईसी प्रोफाइल, लॉग-इन डिटेल, आईपी एड्रेस और डिवाइस आईडी खंगालनी शुरू कर दी गई है। साथ ही इंडसइंड बैंक में खाता खोलने के दौरान उपयोग किए गए दस्तावेज, वीडियो केवाईसी रिकॉर्ड और आवेदन फॉर्म बैंक से मांगे गए हैं। इसके बाद मोबाइल नंबर की सीडीआर (कॉल डिटेल रिकॉर्ड), ईमेल आईडी की रिकवरी डिटेल और आईपी लॉग को ट्रेस करना शुरू कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, यदि रकम किसी अन्य बैंक में ट्रांसफर हुई है तो उस खाते की लेनदेन भी खंगाली जाएगी। सूत्रों के अनुसार, फर्जी खातों में अक्सर असली धारक को भनक तक नहीं लगती। अपराधी पहले भरोसा जीतते हैं, फिर दस्तावेज लेकर डिजिटल तरीके से खाता खोलते हैं और उसे ‘म्यूल अकाउंट’ की तरह इस्तेमाल करते हैं। साइबर एक्सपर्ट एसपी क्राइम सुधीर जायसवाल ने बताया कि जागरूकता से ही साइबर अपराध से बचा जा सकता है। लोगों की जागरुकता ही इस तरह के अपराध से बचने में मददगार होगी।
कैसे चलता है रैकेट
साइबर सेल के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के रैकेट में तीन स्तर होते हैं। इसमें डेटा कलेक्टर, जो केवाईसी या सरकारी योजना का झांसा देकर आधार-पैन जुटाता है। इसके बाद फर्जी मोबाइल नंबर और ई-मेल से बैंक खाता खोलता है। फिर ठगी की रकम इन खातों में घुमाकर आगे ट्रांसफर करता है।
योजना का लाभ बना जाल
ट्यूशन टीचर ने शिवरिया निवासी सुधाकर यादव को बताया कि केवाईसी अपडेट कराने पर सरकारी योजना के तहत 2000 रुपये मिलेंगे। रकम खाते में भेजकर भरोसा पक्का किया गया। बाद में उसी दस्तावेज से दूसरा खाता खोलकर बड़े लेनदेन किए गए। जब दूसरे जिले की साइबर यूनिट से नोटिस आया, तब पीड़ित को फर्जी खाते की जानकारी हुई।
साइबर टीम को इन चुनौतियों का करना पड़ेगा सामना
साइबर टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती फर्जी सिम कार्ड और वर्चुअल आईपी एड्रेस है। कई बार आरोपी वीपीएन या क्लाउड सर्वर का उपयोग करते हैं, जिससे लोकेशन छिप जाती है। हालांकि, डिजिटल फॉरेंसिक से डिवाइस फिंगरप्रिंट और बैंकिंग ट्रेल के जरिये आरोपी तक पहुंचने की कोशिश की जाती है।
बचाव के उपाय
आधार और पैन की कॉपी किसी को भी बिना लिखित उद्देश्य न दें।
बैंक खाते की नियमित निगरानी करें।
संदिग्ध लेनदेन पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन या साइबर पोर्टल पर शिकायत करें।