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Ekadashi: प्रबोधिनी एकादशी 15 को, शुरू हो जाएंगे मांगलिक कार्य

Sat, 13 Nov 2021 04:35 PM IST
vivek shukla संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर।

सार

चार महीने के बाद निद्रा से जागेंगे भगवान विष्णु, श्रद्धा व्रत रख विधि-विधान से करेंगे पूजा-अर्चना, चंद्रमा की स्थिति मीन राशि में होने से शुभता में होगी वृद्धि।
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एकादशी 2021 - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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प्रबोधिनी एकादशी (देवउठनी) सोमवार को मनाई जाएगी। ऐसी मान्यता है कि चार माह तक शयन करने के बाद भगवान विष्णु इस दिन नींद से जागते हैं। इन चार महीनों में किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। प्रबोधिनी एकादशी के साथ ही मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाएगी। इस दिन व्रत के साथ भगवान विष्णु के पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है।

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वाराणसी से प्रकाशित हृषिकेश पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय छह बजकर 36 मिनट और एकादशी का मान सुबह आठ बजकर 51 मिनट तक, पश्चात द्वादशी तिथि है। धर्मशास्त्र के अनुसार, द्वादशी से मिलने वाली एकादशी को अत्यंत उत्तम एवं प्रशस्त माना गया है। इसलिए व्रत और अर्चन के लिए यही दिन मान्य रहेगा। चंद्रमा की स्थिति बृहस्पति के राशि मीन पर होने से यह समस्त शुभता को प्रदान करने वाला रहेगा।

प्रबोधिनी एकादशी का महत्व
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, प्रबोधिनी एकादशी व्रत करने से व्रतियों को सहस्रों अश्वमेध का फल प्राप्त होता है। व्रत के प्रभाव से उसे वीर, पराक्रमी और यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होती है। यह व्रत पापनाशक, पुण्यवर्धक तथा ज्ञानियों को मुक्तिदायक सिद्ध होता है। यह व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्नता देने वाला और विष्णु धाम की प्राप्ति कराने वाला है। इस व्रत को करने से समस्त तीर्थों का घर में निवास हो जाता है।
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रात्रि जागरण का विशेष महत्व
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार, इस तिथि को रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात्रि में कीर्तन, वाद्य यंत्रों, नृत्य और पुराणों का वाचन करना चाहिए। धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गंध, चंदन, फल आदि से पूजन करके घंटा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि से भगवान से जागने की प्रार्थना करें। इसके बाद भगवान की आरती करें और पुष्पांजलि अर्पण करके प्रह्लाद, नारद, परशुराम, पुंडरीक, व्यास, अंबरीष, शुक, शौनक और भीष्मादि भक्तों का स्मरण करके चरणामृत और प्रसाद का वितरण करना चाहिए।

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तुलसी विवाह का होगा आयोजन

पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार, कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन ही श्रद्धालु तुलसी विवाह का आयोजन करते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के श्रीविग्रह के साथ तुलसी का विवाह धूमधाम से किया जाता है। तुलसी के पौधे को गमला आदि में रखकर उसे सजाकर, उसके चारों ओर ईख का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग की प्रतीक चुनरी चढ़ाएं। वृक्ष को साड़ी में लपेटकर टुकड़ी पहनाकर उसका शृंगार करें। गणपति आदि देवों के साथ भगवान शालिग्राम का पूजन करें और भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसी की सात परिक्रमा कराएं और आरती के साथ विवाह का उत्सव पूर्ण करें।

शुरू हो जाएंगे वैवाहिक कार्य
पंडित बृजेश पांडेय के अनुसार, भगवान विष्णु चार महीने की अखंड निद्रा का परित्याग कर सोमवार को जग जाएंगे। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि समस्त मांगलिक कार्य विष्णु शयन में निषिद्ध है। भगवान के जाग्रत हो जाने के पश्चात ही विवाह सहित समस्त मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे।

ये हैं इस साल के लग्न-मुहूर्त
नवंबर 14, 16, 20, 21, 28, 29 और 30 नवंबर
दिसंबर: 1, 2, 7, 8, 9, 11, 12 और 13 दिसंबर
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