कोरोना का प्रकोप कम होने से भले ही सामान्य जनजीवन तेजी से पटरी पर आ रहा है लेकिन ट्रेनों के कोच अटेंडेंट अब भी इस झटके से उबरने की जद्दोजहद कर रहे हैं। ट्रेनों में बेडरोल बंद होने से उनकी नौकरी चली गई। अब दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो गया है।
गोरखपुर जंक्शन के मैकेनाइज्ड लांड्री पर 150 कोच अटेंडेंट और सौ आउटसोर्सिंग के तहत लाए गए कर्मचारी कार्यरत थे। आउटसोर्स कर्मचारी बेडरोल की धुलाई व पैकिंग में लगाए गए थे। तकरीबन एक साल पहले मार्च में जब ट्रेनों का संचालन बंद हुआ तो कोच अटेंडेंट बेरोजगार हो गए।
जुलाई 2020 से ट्रेनों का संचलन तो शुरू हुआ लेकिन एसी कोच में बेडरोल (चादर, कंबल, तकिया, तौलिया) की सुविधा बंद कर दी गई। ऐसे में एक साल से जंक्शन पर कार्यरत 250 कर्मचारी बेरोजगार हैं। इस बीच कुछ ने मजदूरी शुरू कर दी तो कई कोच अटेंडेंट दुकानों पर काम करने लगे। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि रेलवे जल्द पुरानी व्यवस्था बहाल करेगा।
साल भर से बेरोजगार हूं
सालभर होने को हैं, कोई काम-धंधा नहीं है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं। बस एक उम्मीद है कि कोच में पुरानी व्यवस्था फिर शुरू होगी तो नौकरी लग जाएगी। - अजय श्रीवास्तव, कोच अटेंडेंट
कोच अटेंडेंट की नौकरी भले ही आउटसोर्सिंग की थी, घर का खर्च चल जाता था। एक वर्ष से पीआरकेएस कार्यालय पर रहता हूं। रेल प्रशासन ट्रेन में बेडरोल शुरू करे। - जीतेंद्र कुमार, कोच अटेंडेंट
परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है। एक दुकान पर नौकरी की। लेकिन इससे गुजारा कहां हो पाएगा। रेलवे प्रशासन से मांग है कि हमें आउटसोर्सिंग पर कहीं समायोजित करे।-दयानाथ सिंह, कोच अटेंडेंट
मैंने तो कोच अटेंडेंट की नौकरी की उम्मीद ही छोड़ दी। अब लाई भूनने वाली मशीन लाया हूं। उसे पैकिंग करके बेचूंगा। कम से कम परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ तो हो जाएगा।-दयानंद गौतम, कोच अटेंडेंट