क्षेत्र में भेड़ पालन कर जीवन यापन करने वाले लोगों का परंपरागत रूप से भेड़पालन करना ही मुख्य कार्य रहा है। बदलते समय के साथ भेड़ के बालों से बने कंबल आदि की मांग घट जाने से इसकी बिक्री नहीं हो पा रही है लेकिन पिछले छह सात सालों से इनके मुख्य व्यवसाय पर भी ग्रहण लग गया। भेड़पालकों का कहना है कि अब बाल एकत्र होते हैं लेकिन कोई खरीदने नहीं आता ऐसे में कभी कभी बालों को फेंकना पड़ जाता है।
साल में तीन बार कटते हैं बाल
भेड़ पालकों ने बताया कि साल में तीन बार भेड़ के बाल काटे जाते हैं। यदि समय पर भेड़ों के बाल नहीं काटे जाए तो वह एक निश्चित समय पर गिर जाते हैं और देर से बाल काटने पर भेड़ों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। जिस वजह से भेड़ों के बाल काटकर घर में रखना पड़ता है।
ऐसे में अब यह भेड़पालक सरकार से मदद की गुहार कर रहे हैं। राजकीय ऊन वर्गीकरण एवं क्रय विक्रय केंद्र जंगल कौड़िया में लगभग 15 सालों से बंद है। जिसके कारण भेड़ पालकों को बाल को बेचने में अनेक समस्या का सामने करना पड़ता है।
भेड़ पालक श्यामदेव पाल ने कहा कि भेड़ के बालों का मूल्य दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है, जिसके कारण जीविका उपार्जन में समस्या का सामना करना पड़ता है।
भेड़ पालक श्रीराम पाल ने कहा कि सरकारी क्रय केंद्र नहीं होने से सस्ते दाम में भेड़ के बाल को बेचना पड़ता है। जिससे हम भेड़ पालक आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं।
गोरखपुर मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. भूपेंद्र सिंह ने कहा कि किसानों की समस्या को शासन को अवगत कराया जाएगा। साथ ही ब्लॉक पर बना ऊन क्रय - विक्रय केंद्र नियमानुसार चालू कराया जाएगा।