महासमाधि दिवस पर विशेष
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। क्रियायोग परंपरा में मार्च का महीना दो महान संतों की दिव्य स्मृति को जागृत करता है। योगानंद के गुरु युक्तेश्वर गिरि ने योगानंद को दस वर्षों तक प्रशिक्षित किया था।आध्यात्मिक जगत के विख्यात संत और विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ ''''योगी कथामृत'''' के लेखक परमहंस योगानंद ने सात मार्च 1952 को महासमाधि ली थी, जबकि कोलकाता के रहने वाले उनके गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि ने नौ मार्च 1936 को महासमाधि में प्रवेश किया था।
क्रियायोग परंपरा में गुरु के देह त्याग की अवस्था को ''''महासमाधि'''' कहा जाता है, जब एक सिद्ध योगी पूर्ण चेतना के साथ अपनी नश्वर देह का त्याग करता है। बताया जाता है कि दोनों ही गुरुओं ने शरीर त्यागने से पूर्व अपने शिष्यों को यह आश्वासन दिया था कि वे सदैव उनके साथ रहेंगे और आध्यात्मिक मार्ग पर उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे।
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य सुधीर यादव ने बताया कि योगानंद ने अपनी एक कविता में लिखा था कि वे अपने शिष्यों के साथ अदृश्य रूप से चलेंगे और उनकी रक्षा करेंगे। योगानंद की अपने गुरु युक्तेश्वर गिरि से पहली भेंट 17 वर्ष की आयु में वाराणसी में हुई थी। उस समय वे अपने सच्चे गुरु की खोज में थे। युक्तेश्वर ने लगभग दस वर्षों तक उन्हें कठोर अनुशासन और आध्यात्मिक प्रशिक्षण दिया। यह प्रशिक्षण केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं बल्कि क्रियायोग के वैश्विक प्रसार के लिए था। क्रियायोग को तेज आध्यात्मिक उन्नति का वैज्ञानिक मार्ग माना जाता है।
महासमाधि दिवस पर कार्यक्रम आज
सुधीर यादव ने बताया कि परमहंस योगानंद की महासमाधि को क्रियायोग की शक्ति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है। उनके देह त्याग के कई दिनों बाद भी शरीर में किसी प्रकार के क्षय के संकेत नहीं पाए गए, जिसे आध्यात्मिक जगत में योग और ध्यान की प्रभावशाली साधना का प्रमाण माना जाता है। दोनों गुरुओं की महासमाधि पर कार्यक्रम रविवार को होगा।