गोरखपुर। पद्मश्री प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि रचना, रचनाकार के मन में स्वतः स्फूर्त होती है। रचनात्मकता का अपना विशिष्ट स्वभाव है। साहित्य के लिए कोई सीमित दायरा नहीं होता है। सारी सृष्टि साहित्य का विस्तार है।
वह भारतीय स्टेट बैंक के प्रशासनिक कार्यालय में सोमवार को नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के तत्वावधान में ‘साहित्य की प्रासंगिकता और पुस्तक संस्कृति’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संपूर्ण ब्रह्मांड किसी रचनाकार का क्षेत्र है, जिसके एक छोर पर करुणा होती है और दूसरे छोर पर न्याय-भाव होता है। साहित्य इन दोनों के बीच प्रवाहित है। स्वागत वक्तव्य मॉड्यूल प्रमुख, उप महाप्रबंधक (व्यवसाय एवं परिचालन) सुमन बख्शी ने दिया।
कार्यक्रम के दूसरे खंड में नगर राजभाषा कार्यांवयन समिति (बैंक व बीमा) के सदस्य-कार्यालयों के स्टाफ सदस्यों के लिए चित्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें 27 प्रतिभागी शामिल हुए। संयोजन मुख्य प्रबंधक, राजभाषा अर्पण कुमार ने किया।